रोज़ा
इमाम अली बिन हुसैन ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने अपने साथियों से फ़रमाया: “रसूल-ए-ख़ुदा (स) पूरे शाबान के महीने में रोज़ा रखते थे। इसलिए जो शख़्स रसूल-ए-ख़ुदा (स) की मोहब्बत में अल्लाह के क़रीब होना चाहता है और दुनिया व आख़िरत की नेमतें, फ़ज़्ल और सवाब हासिल करना चाहता है, उसे चाहिए कि शाबान को रमज़ान से जोड़ दे (रोज़े और ख़ास इबादतों में)।”
सदक़ा
“शाबान में सबसे बेहतरीन अमल कौन से हैं?” इमाम (अ) ने फ़रमाया: “सदक़ा देना और इस्तिग़फ़ार करना शाबान के सबसे अच्छे आमाल हैं। बेशक अगर तुम में से कोई शाबान में सदक़ा देता है तो अल्लाह उसे उसी तरह बढ़ाता है जैसे तुम अपने ऊँट के बच्चे को पालते हो, यहाँ तक कि क़यामत के दिन वह सदक़ा पहाड़-ए-उहुद के बराबर हो जाएगा।” यह जहन्नम की आग से निजात का ज़रिया है।
इस्तिग़फ़ार तलब करना
रिवायतों के मुताबिक शाबान में पढ़ी जाने वाली सबसे बेहतरीन दुआएँ अल्लाह से मग़फ़िरत मांगने की दुआएँ हैं (यानी इस्तिग़फ़ार)। इसलिए शाबान में रोज़ाना सत्तर मर्तबा अल्लाह से मग़फ़िरत मांगना दूसरे महीनों में सत्तर हज़ार मर्तबा मग़फ़िरत मांगने के बराबर है
। हर दिन 70 मर्तबा पढ़ें :
पूरे महीने में किसी भी वक़्त नीचे लिखी दुआ 1000 मर्तबा पढ़ें
पंद्रहवीं के बाद हर रात यह दुआ पढ़ें।
हर गुरुवार
रोज़ा रखना बहुत ज़्यादा मुस्तहब है।दो रकअत नमाज़ पढ़ें। हर रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा के बाद सूरह अल-इख़लास 100 मर्तबा पढ़ें।
सलाम के बाद सलवात 100 मर्तबा पढ़ें।
अल्लाह तआला दुनिया की 20 और आख़िरत की 20 ज़रूरतें पूरी फ़रमाता है।
रिवायतों में आया है कि शाबान के हर गुरुवार को आसमान सजाए जाते हैं और फ़रिश्ते अल्लाह से दुआ करते हैं कि उस दिन रोज़ा रखने वालों को बख़्श दे और उनकी दुआएँ क़बूल करे।
शाबान के हर जुमे को ज़ियारत जामिआ कबीरा पढ़ें (मदरसा-तुल-क़ायम, आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई, उस्ताद-ए-इरफ़ानियत, इमाम ख़ुमैनी)।
तहज्जुद और तमाम नफ़िला नमाज़ें पढ़ें और हफ़्ते में एक बार क़ब्रिस्तान की ज़ियारत करें।
इमाम अली बिन हुसैन ज़ैनुल आबेदीन (अ) से मनक़ूल ख़ास सलवात रोज़ दोपहर पढ़ें
सलवात जितना हो सके उतनी पढ़ें।
दिल की हाज़िरी के साथ मुनाजात-ए-शाबानिया पढ़ें।
किसी भी वक़्त चार रकअत नमाज़ पढ़ें। हर रकअत में सूरह अल-हम्द के बाद सूरह अत-तौहीद 50 मर्तबा पढ़ें। रसूल-ए-अकरम मुहम्मद अल-मुस्तफ़ा (स) ने फ़रमाया: “जो शख़्स शाबान के महीने में यह अमल करेगा, मौत के वक़्त उसकी रूह आसानी से निकाली जाएगी, उसकी क़ब्र वसीअ हो जाएगी और क़यामत के दिन जब वह क़ब्र से उठेगा तो उसका चेहरा पूरे चाँद की तरह रोशन होगा और कलिमा-ए-शहादत उसकी ज़बान पर होगा।”
क़ुरआन-ए-मजीद जितना हो सके पढ़ें। जब अबू सल्त अल-हरवी शाबान के आख़िरी हफ़्ते में इमाम अली अल-रज़ा (अ) की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो इमाम ने फ़रमाया: ऐ अबू सल्त! अपने लिए फ़ायदेमंद आमाल में मशग़ूल रहो। बहुत ज़्यादा दुआ करो और इस्तिग़फ़ार पढ़ो। क़ुरआन-ए-मजीद जितना हो सके पढ़ते रहो।
शाबान की हर रात के लिए ख़ास नमाज़ें
शाबान की पहली तारीख़ के आमाल – अलग पेज
शाबान की बरकतें और पहली तारीख़ की अहमियत – इक़बाल-उल-आमाल
रोज़ा रखें . ग़ुस्ल करें
नए महीने के अमाल और दुआपहली रात:
इक़बाल-ए-आमाल में बहुत सी दुआएँ बयान की गई हैं जिनका सवाब बहुत ज़्यादा है :-
i)दो रकअत नमाज़, हर रकअत में सूरह अल-हम्द और तीन मर्तबा सूरह अल-इख़लास पढ़ें, फिर यह कहें
ii)बारह रकअत नमाज़ पढ़ें, हर रकअत में सूरह अल-हम्द के बाद पंद्रह मर्तबा सूरह अल-इख़लास पढ़ें।
iii) पहले तीन दिन रोज़ा रखें और हर रात दो रकअत नमाज़ पढ़ें, हर रकअत में सूरह अल-हम्द और ग्यारह मर्तबा सूरह अल-इख़लास पढ़ें। सैयद इब्ने तावूस ने रसूल-ए-ख़ुदा (स) से रिवायत की है कि जो शख़्स इस महीने के पहले तीन दिन रोज़ा रखे और रातों में यह अमल करे, उसे बहुत बड़ा सवाब दिया जाता है।
यह बहुत बड़ी फ़ज़ीलत का दिन है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत है कि जो इस दिन रोज़ा रखे, उसके लिए जन्नत की ज़मानत है।
पहली शाबान – सैय्यदा ज़ैनब (अ) की विलादत से संबंधित कुछ रिवायतें
चाँद देखने की दुआ
रोज़ दोपहर यह सलवात पढ़ें
अलग पेज
हवाले
यह दुआ कई मशहूर किताबों-ए-हदीस में रिवायत की गई है। उनमें से कुछ यह हैं:
1. इक़बाल-उल-आमाल – सैयद इब्न तावूस, पृष्ठ 688
2. अल-बलद अल-अमीन – अल्लामा कफ़आमी, पृष्ठ 186
3. अल-मिस्बाह – अल्लामा कफ़आमी, पृष्ठ 544
4. मिस्बाह अल-मुज्तहिद – शैख़ तूसी, पृष्ठ 45, 838
5. जमाल अल-उस्बू – सैयद इब्न तावूस, पृष्ठ 405
6. वसाइल-उश-शिया – शैख़ हुर आमिली, खंड 10, पृष्ठ 492
7. बिहार अल-अनवार – अल्लामा मजलिसी, जिल्द 87, पृष्ठ 20
हमारे इमाम (अ) इस दुआ को बार-बार पढ़ा करते थे। शैख़ तूसी के अल्फ़ाज़ में,
کان علي بن الحسين عليه السلام يدعو عند کل زوال من ايام شعبان وفي ليله النصف منه ويصلي علي النبي صلي الله عليه واله بهذه الصلوات
"शाबान के महीने में इमाम अली बिन हुसैन ज़ैनुल आबेदीन (अ) रोज़ दोपहर और पंद्रहवीं रात को (बल्कि पूरे महीने) इस दुआ को पढ़ते थे और इसी सलवात के अल्फ़ाज़ में नबी (स) पर सलवात भेजते थे।[1]
एक और वीडियो3 शाबान – इमाम हुसैन इब्न अली (अ) की विलादत
इस दिन पढ़ी जाने वाली 2 दुआएँ
अलग पेज
शैख़ तूसी अपनी किताब *मिस्बाह अल-मुतहज्जिद* में लिखते हैं कि: इमाम हुसैन इब्न अली (अ) तीसरी शाबान को पैदा हुए। अबुल-क़ासिम इब्न अला हमदानी, जो इमाम हसन अस्करी (अ) के नुमाइंदे थे, उन्हें एक लिखित संदेश मिला कि हमारे मौला इमाम हुसैन इब्न अली (अ) तीसरी शाबान को पैदा हुए हैं। इसलिए तुम्हें चाहिए कि
इस दिन रोज़ा रखो और यह दुआ पढ़ो:
इसके बाद आप दुआ-ए-हुसैन पढ़ सकते हैं। यह वह आख़िरी दुआ है जो इमाम हुसैन (अ) ने आशूरा के दिन, जब दुश्मनों ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया था, पढ़ी थी। इब्न अय्याश ने हुसैन बिन अली बिन सुफ़यान अल-बाज़ूफ़ी से रिवायत की है कि उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को तीसरी शाबान, इमाम हुसैन (अ) की विलादत के दिन, यह दुआ पढ़ते हुए सुना।
15वीं शाबान – ईमाम मेहदी (अ:त:फ़) की विलादत
13-14-15 रजब के आमाल (शाबान के लिए भी यही अमाल है)
15 शाबान के आमाल
मुनाजात – अलग पेज
इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ.) और पाक इमाम (अ.) इस मुनाजात को माह-ए-शाबान में पढ़ा करते थे।” इसे हर समय दिल की गहराई के साथ पढ़ना मुस्तहब है।
اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मद
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर अपनी रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमा
وَٱسْمَعْ دُعَائِي إِذَا دَعَوْتُكَ
वस्मअ् दुआई इज़ा दअव्तुका
और मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमा जब मैं तुझ से दुआ करता हूँ
وَٱسْمَعْ نِدَائِي إِذَا نَادَيْتُكَ
वस्मअ् निदाई इज़ा नादैतुका
और मेरी पुकार सुन जब मैं तुझे पुकारता हूँ
وَأَقْبِلْ عَلَيَّ إِذَا نَاجَيْتُكَ
व अक़्बिल् अलय्या इज़ा नाजैतुका
और मेरी तरफ़ तवज्जोह फ़रमा जब मैं तुझ से सरगोशी करता हूँ
فَقَدْ هَرَبْتُ إِلَيْكَ
फ़क़द् हरब्तु इलैका
मैं सब छोड़कर तेरी तरफ़ भाग आया हूँ
وَوَقَفْتُ بَيْنَ يَدَيْكَ مُسْتَكِيناً لَكَ
व वक़फ्तु बैना यदैक मुस्तकीनन लका
और तेरे सामने अदब और आज़िज़ी के साथ खड़ा हूँ
مُتَضَرِّعاً إِلَيْكَ
मुतदर्रिअन इलैका
गिड़गिड़ाते हुए तेरी तरफ़ रुजू करता हूँ
رَاجِياً لِمَا لَدَيْكَ ثَوَابِي
राजियन लिमा लदैका सवाबी
और उस सवाब की उम्मीद रखता हूँ जो तेरे पास है
وَتَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي
व तअलमु मा फ़ी नफ़्सी
तू मेरे दिल के हाल को जानता है
وَتَخْبُرُ حَاجَتِي
व तख़्बुरु हाजती
और मेरी ज़रूरतों से पूरी तरह वाक़िफ़ है
وَتَعْرِفُ ضَمِيرِي
व तअरिफ़ु ज़मीरी
और मेरे दिल के भेद को पहचानता है
وَلاَ يَخْفَىٰ عَلَيْكَ أَمْرُ مُنْقَلَبِي وَمَثْوَايَ
व ला यख़्फ़ा अलैका अम्रु मुन्क़लबी व मसवाया
मेरी हर हालत और हर ठिकाना तुझ से छुपा नहीं है
وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُبْدِئَ بِهِ مِنْ مَنْطِقِي
व मा उरीदु अन उबदिआ बिही मिन मन्तिक़ी
और जो बातें मैं कहना चाहता हूँ
وَأَتَفَوَّهَ بِهِ مِنْ طَلِبَتِي
व अतफ़व्वह बिही मिन तलिबती
और जो माँग मैं ज़बान पर लाना चाहता हूँ
وَأَرْجُوهُ لِعَاقِبَتِي
व अरजूहु लि आक़िबती
और जिस अंजाम की मैं उम्मीद करता हूँ
وَقَدْ جَرَتْ مَقَادِيرُكَ عَلَيَّ يَا سَيِّدِي
व क़द जरत मक़ादिरुका अलय्या या सैय्यिदी
ऐ मेरे मौला! तेरे फ़ैसले मुझ पर जारी हो चुके हैं
فِيمَا يَكُونُ مِنِّي إِلَىٰ آخِرِ عُمْرِي
फ़ीमा यकूनु मिन्नी इला आख़िरि उम्री
मेरी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक
مِنْ سَرِيرَتِي وَعَلانِيَتِي
मिन सरीरती व अलानियत़ी
चाहे वह छुपा हुआ हो या ज़ाहिर
وَبِيَدِكَ لاَ بِيَدِ غَيْرِكَ زِيَادَتِي وَنَقْصِي
व बियदिका ला बियदि ग़ैरिका ज़ियादती व नक़्सी
मेरी बढ़ोतरी और कमी सिर्फ़ तेरे हाथ में है
وَنَفْعِي وَضَرِّي
व नफ़्अी व ज़र्री
और मेरा फ़ायदा और नुकसान भी
إِلٰهِي إِنْ حَرَمْتَنِي فَمَنْ ذَا ٱلَّذِي يَرْزُقُنِي
इलाही इन हरम्तनी फ़मन ज़ा अल्लज़ी यरज़ुक़ुनी
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू मुझे महरूम कर दे तो कौन है जो मुझे रोज़ी देगा
وَإِنْ خَذَلْتَنِي فَمَنْ ذَا ٱلَّذِي يَنْصُرُنِي
व इन ख़ज़ल्तनी फ़मन ज़ा अल्लज़ी यनसुरुनी
और अगर तू मुझे छोड़ दे तो कौन मेरी मदद करेगा
إِلٰهِي أَعُوذُ بِكَ مِنْ غَضَبِكَ وَحُلُولِ سَخَطِكَ
इलाही अऊज़ु बिका मिन ग़ज़बिका व हुलूलि सख़तिका
ऐ मेरे मौला! मैं तेरे ग़ज़ब और नाराज़गी से तेरी पनाह चाहता हूँ
إِلٰهِي إِنْ كُنْتُ غَيْرَ مُسْتَأْهِلٍ لِرَحْمَتِكَ
इलाही इन कुंतु ग़ैरा मुस्तअहिलिं लिरहमतिका
ऐ अल्लाह! अगर मैं तेरी रहमत के क़ाबिल नहीं
فَأَنْتَ أَهْلٌ أَنْ تَجُودَ عَلَيَّ بِفَضْلِ سَعَتِكَ
फ़अंता अहलुन अन तजूद अलय्या बिफ़ज़्लि सअतिक
तो तू अपनी वसीअ फ़ज़्ल और करम से मुझे नवाज़ने वाला है
إِلٰهِي كَأَنِّي بِنَفْسِي وَاقِفَةٌ بَيْنَ يَدَيْكَ
इलाही कअन्नी बिनफ़्सी वाक़िफ़तुन बैना यदैक
ऐ मेरे मौला! गोया मैं ख़ुद को तेरे सामने खड़ा देख रहा हूँ
وَقَدْ أَظَلَّهَا حُسْنُ تَوَكُّلِي عَلَيْكَ
व क़द अज़ल्लहा हुस्नु तवक्कुली अलैक
और मेरी तुझ पर अच्छी उम्मीद ने मुझे साया दे रखा है
فَقُلْتَ مَا أَنْتَ أَهْلُهُ وَتَغَمَّدْتَنِي بِعَفْوِكَ
फ़क़ुल्ता मा अंता अह्लुहू व तग़म्मदतनी बिअफ़्विका
तो तूने वही फ़रमाया जो तेरी शान के लायक़ था और मुझे अपनी माफ़ी की चादर में ढाँप लिया
إِلٰهِي إِنْ عَفَوْتَ فَمَنْ أَوْلَىٰ مِنْكَ بِذٰلِكَ
इलाही इन अफ़वता फ़मन औला मिंका बि ज़ालिका
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू माफ़ करे तो तुझ से बढ़कर माफ़ करने वाला कौन हो सकता है
وَإِنْ كَانَ قَدْ دَنَا أَجَلِي وَلَمْ يُدْنِنِي مِنْكَ عَمَلِي
व इन काना क़द दना अजलि व लम युद्निनी मिंका अमली
और अगर मेरी मौत का वक़्त क़रीब आ गया हो और मेरे आमाल मुझे तेरे क़रीब न ला सके हों
فَقَدْ جَعَلْتُ ٱلإِقْرَارَ بِٱلذَّنْبِ إِلَيْكَ وَسِيلَتِي
फ़क़द जअल्तुल इक़रारा बिज़्ज़म्बि इलैका वसीलती
तो मैं अपने गुनाहों का इकरार ही तेरी तरफ़ आने का ज़रिया बनाता हूँ
إِلٰهِي قَدْ جُرْتُ عَلَىٰ نَفْسِي فِي ٱلنَّظَرِ لَهَا
इलाही क़द जुर्तु अला नफ़्सी फ़िन्नज़रि लहा
ऐ मेरे अल्लाह! मैंने अपनी जान पर ज़ुल्म किया और उसकी परवाह न की
فَلَهَا ٱلْوَيْلُ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَهَا
फ़लहा अल-वैलु इन लम तग़्फ़िर लहा
अगर तूने माफ़ न किया तो उसके लिए हलाकत है
إِلٰهِي لَمْ يَزَلْ بِرُّكَ عَلَيَّ أَيَّامَ حَيَاتِي
इलाही लम यज़ल बिर्रुका अलय्या अय्यामा हयाती
ऐ मेरे अल्लाह! मेरी पूरी ज़िंदगी में तेरा करम मुझ पर जारी रहा
فَلاَ تَقْطَعْ بِرَّكَ عَنِّي فِي مَمَاتِي
फ़ला तक़्तअ् बिर्रका अन्नी फ़ी ममाती
तो मेरी मौत के वक़्त भी अपना करम मुझ से अलग न कर
إِلٰهِي كَيفَ آيَسُ مِنْ حُسْنِ نَظَرِكَ لِي بَعْدَ مَمَاتِي
इलाही कैफ़ा आयसु मिन हुस्नि नज़रिका ली बअदा ममाती
ऐ मेरे अल्लाह! मैं तेरी रहमत से मौत के बाद कैसे मायूस हो सकता हूँ
وَأَنْتَ لَمْ تُوَلِّنِي إِلاَّ ٱلْجَمِيلَ فِي حَيَاتِي
व अंता लम तुवल्लिनी इल्लल-जमीला फ़ी हयाती
जबकि तूने मेरी ज़िंदगी में हमेशा भलाई ही भलाई की
إِلٰهِي تَوَلَّ مِنْ أَمْرِي مَا أَنْتَ أَهْلُهُ
इलाही तवल्ला मिन अम्री मा अंता अह्लुहू
ऐ मेरे अल्लाह! मेरे सारे मामलों को उसी तरह सँभाल जो तेरी शान के मुताबिक़ हो
وَعُدْ عَلَيَّ بِفَضْلِكَ عَلَىٰ مُذْنِبٍ قَدْ غَمَرَهُ جَهْلُهُ
व उद् अलय्या बिफ़ज़्लिका अला मुज़्निबिन क़द ग़मरहू जहलुहू
और मुझ गुनाहगार पर अपने फ़ज़्ल से लौट आ, जिसे उसकी नादानी ने घेर लिया है
إِلٰهِي قَدْ سَتَرْتَ عَلَيَّ ذُنُوباً فِي ٱلدُّنْيَا
इलाही क़द सतरता अलय्या ज़ुनूबन फ़िद्दुनिया
ऐ मेरे अल्लाह! तूने दुनिया में मेरे गुनाहों को छुपाया
وَأَنَا أَحْوَجُ إِلَىٰ سَتْرِهَا عَلَيَّ مِنْكَ فِي ٱلأُخْرَىٰ
व अना अह्वजु इला सत्रिहा अलय्या मिंका फ़िल आख़िरा
और आख़िरत में तो मुझे इसकी और भी ज़्यादा ज़रूरत है
إِذْ لَمْ تُظْهِرْهَا لِأَحَدٍ مِنْ عِبَادِكَ ٱلصَّالِحِينَ
इज़ लम तुज़्हिरहा लि अहदिन मिन इबादिकस्सालिहीन
जबकि तूने उन्हें अपने किसी नेक बंदे पर भी ज़ाहिर नहीं किया
فَلاَ تَفْضَحْنِي يَوْمَ ٱلْقِيَامَةِ عَلَىٰ رُؤُوسِ ٱلْأَشْهَادِ
फ़ला तफ़ज़हनी यौमल-क़ियामति अला रु ऊसिल अशहाद
तो क़यामत के दिन सबके सामने मुझे रुस्वा न करना
إِلٰهِي جُودُكَ بَسَطَ أَمَلِي
इलाही जूदुका बसता अमली
ऐ मेरे अल्लाह! तेरे करम ने मेरी उम्मीदों को बढ़ा दिया है
وَعَفْوُكَ أَفْضَلُ مِنْ عَمَلِي
व अफ़्वुका अफ़ज़लु मिन अमली
और तेरी माफ़ी मेरे आमाल से कहीं बेहतर है
إِلٰهِي فَسُرَّنِي بِلِقَائِكَ يَوْمَ تَقْضِي فِيهِ بَيْنَ عِبَادِكَ
इलाही फ़सुर्रनी बिलिक़ाइका यौम तक़ज़ी फ़ीही बैना इबादिक
ऐ मेरे अल्लाह! उस दिन मुझे ख़ुशी दे जब तू अपने बंदों के बीच फ़ैसला करेगा
إِلٰهِي ٱعْتِذَارِي إِلَيْكَ ٱعْتِذَارُ مَنْ لَمْ يَسْتَغْنِ عَنْ قَبُولِ عُذْرِهِ
इलाही इतिज़ारी इलैका इतिज़ारु मन लम यस्तग़नी अन क़बूलि उज़्रिही
ऐ मेरे अल्लाह! मैं उसी की तरह माफ़ी चाहता हूँ जिसे माफ़ी क़ुबूल होने की सख़्त ज़रूरत है
فَٱقْبَلْ عُذْرِي يَا أَكْرَمَ مَنِ ٱعْتَذَرَ إِلَيْهِ ٱلْمُسِيئُونَ
फ़क़्बल उज़्री या अकरम मन इतज़रा इलैहिल मुसीऊन
तो मेरी माफ़ी क़ुबूल फ़रमा, ऐ सबसे ज़्यादा करीम जिसे गुनाहगार माफ़ी माँगते हैं
إِلٰهِي لاَ تَرُدَّ حَاجَتِي
इलाही ला तरुद्दा हाजती
ऐ मेरे अल्लाह! मेरी ज़रूरत को रद्द न कर
وَلاَ تُخَيِّبْ طَمَعِي
व ला तुख़य्यिब तमई
और मेरी उम्मीद को मायूस न कर
وَلاَ تَقْطَعْ مِنْكَ رَجَائِي وَأَمَلِي
व ला तक़्तअ् मिंका रजाई व अमली
और मुझ से अपनी रहमत की उम्मीद और आस न तोड़
إِلٰهِي لَوْ أَرَدْتَ هَوَانِي لَمْ تَهْدِنِي
इलाही लौ अरद्ता हवानी लम तहदिनी
अगर तू मुझे ज़लील करना चाहता तो मुझे हिदायत न देता
وَلَوْ أَرَدْتَ فَضِيحَتِي لَمْ تُعَافِنِي
व लौ अरद्ता फ़ज़ीहती लम तुअफ़िनी
और अगर तू मुझे रुस्वा करना चाहता तो मुझे आफ़ियत न देता
إِلٰهِي مَا أَظُنُّكَ تَرُدُّنِي فِي حَاجَةٍ قَدْ أَفْنَيْتُ عُمْرِي فِي طَلَبِهَا مِنْكَ
इलाही मा अज़ुन्नुका तरुद्दुनी फ़ी हाजतिन क़द अफ़नैतु उम्री फ़ी तलबिहा मिंका
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे यक़ीन नहीं कि तू मेरी वह दुआ रद्द करेगा जिसके लिए मैंने पूरी ज़िंदगी तुझ से माँग की
إِلٰهِي فَلَكَ ٱلْحَمْدُ أَبَداً أَبَداً دَائِماً سَرْمَداً
इलाही फ़लक़ल-हम्दु अबदन अबदन दाइमं सरमदं
ऐ मेरे अल्लाह! हमेशा हमेशा, हर वक़्त, हमेशा के लिए सारी हम्द तेरे ही लिए है
يَزِيدُ وَلاَ يَبِيدُ كَمَا تُحِبُّ وَتَرْضَىٰ
यज़ीदु व ला यबीदु कमा तुहिब्बु व तर्ज़ा
जो बढ़ता ही रहता है और कभी खत्म नहीं होता, जैसा तू चाहता है और जैसा तुझे पसंद है
إِلٰهِي إِنْ أَخَذْتَنِي بِجُرْمِي أَخَذْتُكَ بِعَفْوِكَ
इलाही इन अख़ज़्तनी बिज़ुर्मी अख़ज़्तुका बिअफ़्विका
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू मुझे मेरे जुर्म पर पकड़े, तो मैं तेरी माफ़ी को थाम लूँगा
وَإِنْ أَخَذْتَنِي بِذُنُوبِي أَخَذْتُكَ بِمَغْفِرَتِكَ
व इन अख़ज़्तनी बिज़ुनूबी अख़ज़्तुका बिमग़्फ़िरतिका
और अगर तू मुझे मेरे गुनाहों पर पकड़े, तो मैं तेरी बख़्शिश को थाम लूँगा
وَإِنْ أَدْخَلْتَنِي ٱلنَّارَ أَعْلَمْتُ أَهْلَهَا أَنِّي أُحِبُّكَ
व इन अदख़ल्तनीन्नारा आलम्तु अहलहा अन्नी उहिब्बुका
और अगर तू मुझे आग में भी दाख़िल करे, तो मैं उसके रहने वालों से कह दूँगा कि मैं तुझसे मोहब्बत करता हूँ
إِلٰهِي إِنْ كَانَ صَغُرَ فِي جَنْبِ طَاعَتِكَ عَمَلِي
इलाही इन काना सग़ुरा फ़ी जंबि ताअतिक अमली
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तेरी इताअत के सामने मेरे आमाल छोटे हैं
فَقَدْ كَبُرَ فِي جَنْبِ رَجَائِكَ أَمَلِي
फ़क़द कबुरा फ़ी जंबि रजाइका अमली
तो तेरी रहमत से मेरी उम्मीद बहुत बड़ी है
إِلٰهِي كَيْفَ أَنْقَلِبُ مِنْ عِنْدِكَ بِٱلْخَيْبَةِ مَحْرُوماً
इलाही कैफ़ा अंक़लिबु मिन इंदिका बिलख़ैबति महरूमा
ऐ मेरे अल्लाह! मैं तेरे पास से मायूस और महरूम होकर कैसे लौट सकता हूँ
وَقَدْ كَانَ حُسْنُ ظَنِّي بِجُودِكَ أَنْ تَقْلِبَنِي بِٱلنَّجَاةِ مَرْحُوماً
व क़द काना हुस्नु ज़न्नी बिजूदिका अन तक़लिबनी बिन्नजाते मरहूमा
जबकि तेरे करम के बारे में मेरा अच्छा गुमान यही था कि तू मुझे नजात देकर रहमत से नवाज़ेगा
إِلٰهِي وَقَدْ أَفْنَيْتُ عُمْرِي فِي شِرَّةِ ٱلسَّهْوِ عَنْكَ
इलाही व क़द अफ़नैतु उम्री फ़ी शिर्रति सह्वि अंका
ऐ मेरे अल्लाह! मैंने अपनी उम्र तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल रहने में गुज़ार दी
وَأَبْلَيْتُ شَبَابِي فِي سَكْرَةِ ٱلتَّبَاعُدِ مِنْكَ
व अबलैतु शबाबी फ़ी सक्रति तबाअुदि मिंका
और अपनी जवानी तुझसे दूर रहने की बेहोशी में बरबाद कर दी
إِلٰهِي فَلَمْ أَسْتَيْقِظْ أَيَّامَ ٱغْتِرَارِي بِكَ
इलाही फ़लम अस्तैक़िज़ अय्याम इग़्तरारी बिका
ऐ मेरे अल्लाह! मैं अपनी ग़लतफ़हमी के दिनों में जाग न सका
وَرُكُونِي إِلَىٰ سَبِيلِ سَخَطِكَ
व रुकूनी इला सबीली सख़तिक
और तेरी नाराज़गी के रास्ते पर झुका रहा
إِلٰهِي وَأَنَا عَبْدُكَ وَٱبْنُ عَبْدِكَ قَائِمٌ بَيْنَ يَدَيْكَ
इलाही व अना अब्दुका वब्नु अब्दिका क़ाइमुन बैना यदैक
ऐ मेरे अल्लाह! अब मैं तेरा बंदा और तेरे बंदे का बेटा होकर तेरे सामने खड़ा हूँ
مُتَوَسِّلٌ بِكَرَمِكَ إِلَيْكَ
मुतवस्सिलुन बिकरमिक इलैक
तेरे करम के वसीले से तुझसे दुआ माँगता हूँ
إِلٰهِي أَنَا عَبْدٌ أَتَنَصَّلُ إِلَيْكَ مِمَّا كُنْتُ أُوَاجِهُكَ بِهِ
इलाही अना अब्दुन अतनस्सलु इलैका मिम्मा कुंतु उवाजिहुका बिही
ऐ मेरे अल्लाह! मैं तेरा बंदा हूँ और उन बातों से बरी होने की अर्ज़ करता हूँ
مِنْ قِلَّةِ ٱسْتِحْيَائِي مِنْ نَظَرِكَ
मिन क़िल्लति इस्तिह्याई मिन नज़रिका
जो तेरी नज़र के सामने बे-हयाई की वजह से मुझसे हुईं
وَأَطْلُبُ ٱلْعَفْوَ مِنْكَ إِذِ ٱلْعَفْوُ نَعْتٌ لِكَرَمِكَ
व अतलुबुल अफ़्व मिंका इज़िल अफ़्व नअ्तुन लिकरमिक
और तुझसे माफ़ी माँगता हूँ क्योंकि माफ़ करना तेरे करम की पहचान है
إِلٰهِي لَمْ يَكُنْ لِي حَوْلٌ فَأَنْتَقِلَ بِهِ عَنْ مَعْصِيَتِكَ
इलाही लम यकुन ली हौलुन फ़ा-अंतक़िला बिही अन मअसियतिका
ऐ मेरे अल्लाह! मुझमें इतनी ताक़त न थी कि मैं तेरी नाफ़रमानी से बच पाता
إِلاَّ فِي وَقْتٍ أَيْقَظْتَنِي لِمَحَبَّتِكَ
इल्ला फ़ी वक़्तिन ऐक़ज़्तनी लिमहब्बतिका
सिवाय उस वक़्त के जब तूने मुझे अपनी मोहब्बत के लिए जगा दिया
وَكَمَا أَرَدْتَ أَنْ أَكُونَ كُنْتُ
व कमा अरद्ता अन अकूना कुंतु
और मैं वैसा ही बन गया जैसा तू चाहता था
فَشَكَرْتُكَ بِإِدْخَالِي فِي كَرَمِكَ
फ़शकरतुका बिइदख़ाली फ़ी करमिक
तो मैंने तेरा शुक्र अदा किया कि तूने मुझे अपने करम में शामिल किया
وَلِتَطْهِيرِ قَلْبِي مِنْ أَوْسَاخِ ٱلْغَفْلَةِ عَنْكَ
व लितत्हीरी क़ल्बी मिन औसाख़िल ग़फ़्लति अंका
और मेरे दिल को तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल रहने की मैल से पाक कर दिया
إِلٰهِي ٱنْظُرْ إِلَيَّ نَظَرَ مَنْ نَادَيْتَهُ فَأَجَابَكَ
इलाही उन्ज़ुर इलय्या नज़रा मन नादैतहू फ़-अजाबक
ऐ मेरे अल्लाह! मुझ पर वैसी नज़र डाल जैसे तूने उसे देखा जिसे तूने पुकारा और उसने जवाब दिया
وَٱسْتَعْمَلْتَهُ بِمَعُونَتِكَ فَأَطَاعَكَ
व इस्तअमल्तहू बिमआऊनतिका फ़-अताअक
और तूने अपनी मदद से उसे काम में लगाया तो उसने तेरी इताअत की
يَا قَرِيباً لاَ يَبْعُدُ عَنِ ٱلْمُغْتَرِّ بِهِ
या क़रीबन ला यबउदु अनिल मुग़्तर्रि बिही
ऐ क़रीब रहने वाले! जो तुझसे दिल लगाते हैं उनसे तू दूर नहीं होता
وَيَا جَوَاداً لاَ يَبْخَلُ عَمَّنْ رَجَا ثَوَابَهُ
व या जवादन ला यबख़लु अम्मन रजा सवाबहू
और ऐ बड़े करीम! जो तुझसे सवाब की उम्मीद रखे उससे तू बुख़्ल नहीं करता
إِلٰهِي هَبْ لِي قَلْباً يُدْنِيهِ مِنْكَ شَوْقُهُ
इलाही हब ली क़ल्बन युद्नीही मिंका शौक़ुहू
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे ऐसा दिल अता कर जिसकी चाह मुझे तेरे क़रीब ले आए
وَلِسَاناً يُرْفَعُ إِلَيْكَ صِدْقُهُ
व लिसानन युरफ़उ इलैका सिद्क़ुहू
और ऐसी ज़बान दे जिसकी सच्चाई तेरी तरफ़ उठे
وَنَظَراً يُقَرِّبُهُ مِنْكَ حَقُّهُ
व नज़रन युक़र्रिबुहू मिंका हक़्क़ुहू
और ऐसी नज़र दे जिसकी सच्चाई उसे तेरे क़रीब पहुँचा दे
إِلٰهِي إِنَّ مَنْ تَعَرَّفَ بِكَ غَيْرُ مَجْهُولٍ
इलाही इन्ना मन तअर्रफ़ा बिका ग़ैरु मज्हूलिन
ऐ मेरे अल्लाह! जो तुझे पहचान ले वह कभी गुमनाम नहीं रहता
وَمَنْ لاَذَ بِكَ غَيْرُ مَخْذُولٍ
व मन लाज़ा बिका ग़ैरु मख़ज़ूलिन
और जो तुझसे पनाह ले, वह कभी मायूस नहीं होता
وَمَنْ أَقْبَلْتَ عَلَيْهِ غَيْرُ مَمْلُولٍ
व मन अक़बल्ता अलैहि ग़ैरु मम्लूलिन
और जिस पर तू मेहरबानी से रुख़ करे, वह कभी जिल्लत में नहीं पड़ता
إِلٰهِي إِنَّ مَنِ ٱنْتَهَجَ بِكَ لَمُسْتَنِيرٌ
इलाही इन्न मन इन्तहजा बिका लमुस्तनिरुन
ऐ मेरे अल्लाह! जो तेरे रास्ते पर चलता है वह ज़रूर रौशन हो जाता है
وَإِنَّ مَنِ ٱعْتَصَمَ بِكَ لَمُسْتَجِيرٌ
व इन्न मन इतसमा बिका लमुस्तजीरुन
और जो तुझसे मज़बूती से जुड़ जाए, वह पनाह पा लेता है
وَقَدْ لُذْتُ بِكَ يَا إِلٰهِي فَلاَ تُخَيِّبْ ظَنِّي مِنْ رَحْمَتِكَ
व क़द लुज़्तु बिका या इलाही फ़ला तुख़य्यिब ज़न्नी मिन रहमतिका
मैंने तुझी से पनाह ली है ऐ मेरे अल्लाह, तो मेरी उम्मीद को अपनी रहमत से न तोड़
وَلاَ تَحْجُبْنِي عَنْ رَأْفَتِكَ
व ला तह्जुबनी अन रअफ़तिका
और मुझे अपनी मेहरबानी से महरूम न कर
إِلٰهِي أَقِمْنِي فِي أَهْلِ وِلايَتِكَ
इलाही अक़िमनी फी अहलि विलायतिका
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे अपने वली बंदों में शामिल कर
مُقَامَ مَنْ رَجَا ٱلزِّيَادَةَ مِنْ مَحَبَّتِكَ
मुक़ामा मन रजा अज़्ज़ियादता मिन महब्बतिका
उन लोगों के मक़ाम में जो तेरी मोहब्बत में बढ़ोतरी की उम्मीद रखते हैं
إِلٰهِي وَأَلْهِمْنِي وَلَهاً بِذِكْرِكَ إِلَىٰ ذِكْرِكَ
इलाही व अल्हिमनी वलहन बिज़िक्रिका इला ज़िक्रिका
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे अपने ज़िक्र से अपने ही ज़िक्र की दीवानगी अता कर
وَهِمَّتِي فِي رَوْحِ نَجَاحِ أَسْمَائِكَ وَمَحَلِّ قُدْسِكَ
व हिम्मती फी रौहि नजाहि अस्माइका व महल्लि क़ुद्सिका
और मेरी कोशिशों को तेरे नामों की राहत और तेरी पाक जगह की तरफ़ मोड़ दे
إِلٰهِي بِكَ عَلَيْكَ إِلاَّ أَلْحَقْتَنِي بِمَحَلِّ أَهْلِ طَاعَتِكَ
इलाही बिका अलैका इल्ला अल्हक़्तनी बिमहल्लि अहलि ताअतिका
ऐ मेरे अल्लाह! तेरे ही वसीले से तुझसे चाहता हूँ कि मुझे अपने फ़रमाबरदार बंदों के साथ कर दे
وَٱلْمَثْوَىٰ ٱلصَّالِحِ مِنْ مَرْضَاتِكَ
वल्मसवा अस्सालिहि मिन मर्द़ातिका
और अपनी रज़ा वाले नेक ठिकाने में जगह दे
فَإِنِّي لاَ أَقْدِرُ لِنَفْسِي دَفْعاً
फ़इन्नी ला अक़दिरु लिनाफ़्सी दफ़अन
क्योंकि मैं अपनी जान के लिए किसी नुक़सान को टाल नहीं सकता
وَلاَ أَمْلِكُ لَهَا نَفْعاً
व ला अम्लिकु लहा नफ़अन
और न ही कोई फ़ायदा खुद दे सकता हूँ
إِلٰهِي أَنَا عَبْدُكَ ٱلضَّعِيفُ ٱلْمُذْنِبُ
इलाही अना अब्दुकज़् ज़ईफ़ुल मुज़्निबु
ऐ मेरे अल्लाह! मैं तेरा कमज़ोर और गुनहगार बंदा हूँ
وَمَمْلُوكُكَ ٱلْمُنِيبُ
व ममलूकुकल मुनीबु
और तेरा वह गुलाम जो तेरी तरफ़ पलट आया है
فَلاَ تَجْعَلْنِي مِمَّنْ صَرَفْتَ عَنْهُ وَجْهَكَ
फ़ला तज्अलनी मिम्मन सरफ़्ता अन्हु वज्हका
तो मुझे उन लोगों में न कर जिनसे तूने अपना चेहरा फेर लिया
وَحَجَبَهُ سَهْوُهُ عَنْ عَفْوِكَ
व हजबहू सह्वुहू अन अफ़्विका
और जिनकी ग़फ़लत उन्हें तेरी माफ़ी से दूर कर देती है
إِلٰهِي هَبْ لي كَمَالَ ٱلاِنْقِطَاعِ إِلَيْكَ
इलाही हब ली कमालल इनक़िताअि इलैक
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे पूरी तरह अपनी तरफ़ जुड़ जाने की तौफ़ीक़ दे
وَأَنِرْ أَبْصَارَ قُلُوبِنَا بِضِيَاءِ نَظَرِهَا إِلَيْكَ
व अनिर अब्सार क़ुलूबिना बिज़ियाइ नज़रिहा इलैक
और हमारे दिलों की आँखों को अपनी तरफ़ देखने की रौशनी से चमका दे
حَتَّىٰ تَخْرِقَ أَبْصَارُ ٱلْقُلُوبِ حُجُبَ ٱلنُّورِ
हत्ता तख़रिक़ अब्सारुल क़ुलूबी हुजुबल नूरि
यहाँ तक कि दिलों की नज़रें नूर के परदों को चीर दें
فَتَصِلَ إِلَىٰ مَعْدِنِ ٱلْعَظَمَةِ
फ़तसिला इला मअदिनिल अज़मत
और तेरी अज़मत के असल मक़ाम तक पहुँच जाएँ
وَتَصِيرَ أَرْوَاحُنَا مُعَلَّقَةً بِعِزِّ قُدْسِكَ
व तसीरा अरवाहुना मुअल्लक़तन बिइज़्ज़ि क़ुद्सिका
और हमारी रूहें तेरी पाक अज़मत से जुड़ जाएँ
إِلٰهِي وَٱجْعَلْنِي مِمَّنْ نَادَيْتَهُ فَأَجَابَكَ
इलाही वज्अलनी मिम्मन नादैतहू फ़अजाबक
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे उन लोगों में कर जिन्हें तूने पुकारा और उन्होंने जवाब दिया
وَلاحَظْتَهُ فَصَعِقَ لِجَلالِكَ
व लाहज़्तहू फ़सअक़ा लिजलालिका
और जिन पर तूने नज़र डाली तो वे तेरी शान से बेख़ुद हो गए
فَنَاجَيْتَهُ سِرّاً وَعَمِلَ لَكَ جَهْراً
फ़नाजैतहू सिर्रन व अमिला लका जह्रन
तो तूने उनसे छुपकर बात की और उन्होंने खुले आम तेरे लिए अमल किया
إِلٰهِي لَمْ أُسَلِّطْ عَلَىٰ حُسْنِ ظَنِّي قُنُوطَ ٱلأَيَاسِ
इलाही लम उसल्लित अला हुस्नि ज़न्नी क़ुनूतल अयासि
ऐ मेरे अल्लाह! मेरी अच्छी उम्मीद पर मायूसी को हावी न कर
وَلاَ ٱنْقَطَعَ رَجَائِي مِنْ جَمِيلِ كَرَمِكَ
व ला इनक़तआ रजाई मिन जमीली करमिक
और अपनी खूबसूरत सख़ावत से मेरी उम्मीद को न काट
إِلٰهِي إِنْ كَانَتِ ٱلْخَطَايَا قَدْ أَسْقَطَتْنِي لَدَيْكَ
इलाही इन कानतिल ख़ताया क़द अस्क़ततनी लदैका
ऐ मेरे अल्लाह! अगर मेरे गुनाहों ने मुझे तेरे नज़दीक गिरा दिया है
فَٱصْفَحْ عَنِّي بِحُسْنِ تَوَكُّلِي عَلَيْكَ
फ़स्फ़ह अन्नी बिहुस्नि तवक्कुली अलैक
तो मेरी अच्छी तवक्कुल की वजह से मुझे माफ़ कर दे
إِلٰهِي إِنْ حَطَّتْنِيَ ٱلذُّنُوبُ مِنْ مَكَارِمِ لُطْفِكَ
इलाही इन हत्ततनीज़् ज़ुनूबु मिन मकारिमि लुत्फ़िका
ऐ मेरे अल्लाह! अगर मेरे गुनाहों ने मुझे तेरे लुत्फ़ की बुलंदियों से गिरा दिया है
فَقَدْ نَبَّهَنِي ٱلْيَقِينُ إِلَىٰ كَرَمِ عَطْفِكَ
फ़क़द नब्बहनील यक़ीनु इला करमि अत्फ़िका
तो यक़ीन ने मुझे तेरी रहमदिल सख़ावत की तरफ़ जगा दिया है
إِلٰهِي إِنْ أَنَامَتْنِيَ ٱلْغَفْلَةُ عَنِ ٱلإِسْتِعْدَادِ لِلِقَائِكَ
इलाही इन अनामतनील ग़फ़लतु अनिल इस्तिअदादि लिलिक़ाइका
ऐ मेरे अल्लाह! अगर ग़फ़लत ने मुझे तुझसे मुलाक़ात की तैयारी से सुला दिया है
فَقَدْ نَبَّهَتْنِي ٱلْمَعْرِفَةُ بِكَرَمِ آلاَئِكَ
फ़क़द नब्बहतनी अल-मआरिफ़तु बिकरमि आलाइक
तो यक़ीनन तेरी नेमतों की पहचान ने मुझे तेरी सख़ावत की तरफ़ जगा दिया
إِلٰهِي إِنْ دَعَانِي إِلَىٰ ٱلنَّارِ عَظِيمُ عِقَابِكَ
इलाही इन दआनी इलन्नारि अज़ीमु इक़ाबिक
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तेरी सख़्त सज़ा मुझे जहन्नम की तरफ़ बुलाए
فَقَدْ دَعَانِي إِلَىٰ ٱلْجَنَّةِ جَزِيلُ ثَوَابِكَ
फ़क़द दआनी इलल-जन्नति जज़ीलु सवाबिक
तो तेरे बड़े अज्र ने मुझे जन्नत की तरफ़ बुलाया है
إِلٰهِي فَلَكَ أَسْأَلُ وَإِلَيْكَ أَبْتَهِلُ وَأَرْغَبُ
इलाही फ़लका असअलु व इलैका अब्तहिलु व अरग़बु
ऐ मेरे अल्लाह! मैं तुझी से सवाल करता हूँ, तुझी से गिड़गिड़ाता हूँ और तुझी से उम्मीद रखता हूँ
وَأَسْأَلُكَ أَنْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
व असअलुका अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिं व आलि मुहम्मद
और तुझसे दरख़्वास्त करता हूँ कि मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दुरूद भेज
وَأَنْ تَجْعَلَنِي مِمَّنْ يُدِيمُ ذِكْرَكَ
व अन तज्अलनी मिम्मन युदीमु ज़िक्रक
और मुझे उन लोगों में शामिल कर जो हमेशा तेरा ज़िक्र करते रहते हैं
وَلاَ يَنْقُضُ عَهْدَكَ
व ला यन्क़ुज़ु अह्दक
और जो तुझसे किया हुआ वादा नहीं तोड़ते
وَلاَ يَغْفُلُ عَنْ شُكْرِكَ
व ला यग़फ़ुलु अन शुक़्रक
और तेरे शुक्र से ग़ाफ़िल नहीं होते
وَلاَ يَسْتَخِفُّ بِأَمْرِكَ
व ला यस्तख़िफ़्फ़ु बि-अम्रिक
और तेरे हुक्म को हल्का नहीं समझते
إِلٰهِي وَأَلْحِقْنِي بِنُورِ عِزِّكَ ٱلأَبْهَجِ
इलाही व अल्हिक़नी बिनूरी इज़्ज़िकल-अबहज
ऐ मेरे अल्लाह! मुझे अपनी इज़्ज़त के सबसे रौशन नूर में शामिल कर दे
فَأَكُونَ لَكَ عَارِفاً
फ़-अकूना लका आरिफ़न
ताकि मैं तुझे पहचानने वाला बन जाऊँ
وَعَنْ سِوَاكَ مُنْحَرِفاً
व अन सिवाक मुनहरिफ़न
और तेरे सिवा हर चीज़ से मुँह मोड़ लूँ
وَمِنْكَ خَائِفاً مُرَاقِباً
व मिंक ख़ाइफ़न मुराक़िबन
और तुझसे डरने वाला और तुझ पर नज़र रखने वाला बनूँ
يَا ذَا ٱلْجَلاَلِ وَٱلإِكْرَامِ
या ज़ल-जलालि वल-इकराम
ऐ जलाल और इकराम वाले परवरदिगार!
وَصَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ رَسُولِهِ وَآلِهِ ٱلطَّاهِرِينَ
व सल्लल्लाहु अला मुहम्मदिं रसूलिही व आलिहित-ताहिरीन
अल्लाह मुहम्मद अपने रसूल और उनकी पाक आल पर दुरूद भेजे
وَسَلَّمَ تَسْلِيماً كَثِيراً
व सल्लम तस्लीमन कसीरन
और उन पर बहुत ज़्यादा सलाम नाज़िल फ़रमाए
शैख़ असद धारसी द्वारा बेहतर किया गया उर्दू तर्जुमा
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आले मुहम्मद पर अपनी बेहतरीन रहमत नाज़िल फ़रमा ऐ अल्लाह! जब मैं तुझसे दुआ करता हूँ तो मेरी दुआ सुन और जब मैं तुझे पुकारता हूँ तो मेरी फ़रियाद सुन और जब मैं तुझसे धीरे-धीरे बात करता हूँ तो मेरी तरफ़ मुतवज्जेह हो जा यक़ीनन मैं तेरी तरफ़ भाग कर आया हूँ और तेरे सामने खड़ा हूँ इस हाल में कि मैं तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ, तुझसे मिन्नत कर रहा हूँ और उस अज्र की उम्मीद लगाए हुए हूँ जो तू मेरे लिए रखता है और तू जानता है जो कुछ मेरे दिल में है और मेरी ज़रूरतों से बाख़बर है और मेरी हर छुपी हुई हालत से वाक़िफ़ है
और मेरे हालात के तमाम उतार-चढ़ाव और ठहराव तुझसे पोशीदा नहीं और जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ और जो दुआएँ मैं ज़बान पर लाना चाहता हूँ और जो उम्मीदें मैं अपने आख़िरी अंजाम के लिए रखता हूँ — सब तुझे मालूम हैं और ऐ मेरे मालिक! तेरे तय किए हुए फ़ैसले मेरी ज़िंदगी के आख़िर तक मेरे तमाम छुपे और ज़ाहिर मामलों में जारी रहेंगे और मेरी ज़िंदगी का बढ़ना, घटना, फ़ायदा और नुक़सान सब तेरे ही हाथ में है, किसी और के हाथ में नहीं
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे रोक ले तो फिर कौन मुझे रोज़ी देगा? और अगर तू मुझे छोड़ दे तो फिर कौन मेरी मदद करेगा?
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरे ग़ज़ब से और तेरी नाराज़गी का हक़दार बनने से तेरी पनाह चाहता हूँ
ऐ मेरे माबूद! अगर मैं तेरी रहमत के क़ाबिल नहीं हूँ तो भी तू अपनी वसीअ रहमत से मुझ पर करम करने के क़ाबिल है
ऐ मेरे माबूद! ऐसा लगता है जैसे मैं तेरे सामने खड़ा हूँ और तुझ पर मेरा पूरा भरोसा और यक़ीन मुझ पर साया किए हुए है तो तूने वही किया जो तेरी शान के लायक़ था और मुझे अपनी माफ़ी में ढाँप लिया
ऐ मेरे माबूद! अगर तू माफ़ कर दे तो तुझसे बढ़कर माफ़ करने वाला कौन है? और अगर मेरी मौत क़रीब आ गई हो और मेरे आमाल मुझे तेरे क़रीब न ला सके हों तो मैं अपने गुनाहों का इक़रार तेरी बारगाह में वसीला बनाता हूँ
ऐ मेरे माबूद! मैंने अपनी नफ़्स पर ज़ुल्म किया और अगर तू उसे माफ़ न करे तो यक़ीनन वह हलाक हो जाएगी
ऐ मेरे माबूद! तू मेरी पूरी ज़िंदगी मुझ पर मेहरबान रहा तो मेरी मौत के वक़्त भी अपनी नेमत मुझसे मत छीन
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी मेहरबानी से मौत के बाद कैसे मायूस हो सकता हूँ जबकि तूने मेरी ज़िंदगी में मेरे साथ सिवाए भलाई के कुछ नहीं किया
ऐ मेरे माबूद! मेरे मामलों को उसी तरह सँभाल जैसा तेरी शान के मुताबिक़ है और अपनी रहमत से उस गुनाहगार पर मेहर फ़रमा जिसे उसकी नादानी ने घेर लिया है
ऐ मेरे माबूद! तूने दुनिया में मेरे गुनाहों पर पर्दा डाला जबकि आख़िरत में मुझे उस पर्दे की और भी ज़्यादा ज़रूरत है
जब तूने उन्हें अपने नेक बन्दों पर भी ज़ाहिर नहीं किया तो क़यामत के दिन तमाम देखने वालों के सामने मुझे रुस्वा न करना
ऐ मेरे माबूद! तेरी सख़ावत ने मेरी उम्मीदें बढ़ा दी हैं और तेरी माफ़ी मेरे आमाल से कहीं बेहतर है
ऐ मेरे माबूद! उस दिन जब तू अपने बन्दों के बीच फ़ैसला करेगा मुझे अपनी मुलाक़ात से ख़ुश कर देना
ऐ मेरे माबूद! मेरी माफ़ी की दरख़्वास्त उस शख़्स की दरख़्वास्त है जो अपनी माफ़ी क़बूल हुए बिना रह नहीं सकता तो ऐ सबसे ज़्यादा इज़्ज़त देने वाले! मेरी माफ़ी क़बूल फ़रमा
ऐ मेरे माबूद! मेरी दुआ रद्द न करना मेरी उम्मीद को तोड़ना मत और मुझसे अपनी रहमत की उम्मीद मत छीन
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे रुस्वा करना चाहता तो मुझे हिदायत न देता और अगर तू मुझे ज़लील करना चाहता तो मुझे आफ़ियत न देता
ऐ मेरे माबूद! मैं यह गुमान नहीं करता कि तू मेरी वह दुआ ठुकरा देगा जिसके लिए मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी तुझसे माँगते गुज़ार दी
ऐ मेरे माबूद! सारी हम्द हमेशा-हमेशा हमेशा रहने वाली, कभी ख़त्म न होने वाली तेरे ही लिए है जिस तरह तू पसंद करता है और राज़ी होता है
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे मेरे गुनाहों पर पकड़ ले तो मैं तेरी माफ़ी को थाम लूँगा और अगर तू मुझे मेरे कसूरों पर सज़ा दे तो मैं तेरी मग़फ़िरत से लिपट जाऊँगा
और अगर तू मुझे जहन्नम में डाल दे तो मैं उसके रहने वालों से ऐलान कर दूँगा कि मैं तुझसे मोहब्बत करता हूँ
ऐ मेरे माबूद! अगर मेरे आमाल तेरी इताअत के मुक़ाबले में कम हैं तो मेरी उम्मीदें तुझसे बहुत बुलंद हैं
ऐ मेरे माबूद! मैं तुझसे नाकाम होकर कैसे लौट सकता हूँ जबकि तेरी सख़ावत पर मेरा अच्छा गुमान मुझे कामयाबी और रहमत की उम्मीद देता है
ऐ मेरे माबूद! मैंने अपनी ज़िंदगी तुझसे ग़ाफ़िल रहने की लालच में गंवा दी और अपनी जवानी तुझसे दूर रहने की मदहोशी में ज़ाया कर दी
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल रहा और तेरी नाराज़गी के रास्ते पर चलता रहा
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरा बन्दہ हूँ तेरे बन्दे का बेटा हूँ तेरे सामने खड़ा हूँ तेरी सख़ावत का वसीला देकर तुझसे सिफ़ारिश करता हूँ
ऐ मेरे माबूद! मैं वह बन्दा हूँ जो अपनी बेशर्मी और तेरी निगरानी की परवाह न करने पर तुझसे माफ़ी चाहता है और तुझसे बख़्शिश माँगता है क्योंकि माफ़ करना तेरी सख़ावत की पहचान है
इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ.) और पाक इमाम (अ.) इस मुनाजात को माह-ए-शाबान में पढ़ा करते थे।” इसे हर समय दिल की गहराई के साथ पढ़ना मुस्तहब है।
शैख़ असद धारसी द्वारा बेहतर किया गया उर्दू तर्जुमा
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आले मुहम्मद पर अपनी बेहतरीन रहमत नाज़िल फ़रमा ऐ अल्लाह! जब मैं तुझसे दुआ करता हूँ तो मेरी दुआ सुन और जब मैं तुझे पुकारता हूँ तो मेरी फ़रियाद सुन और जब मैं तुझसे धीरे-धीरे बात करता हूँ तो मेरी तरफ़ मुतवज्जेह हो जा यक़ीनन मैं तेरी तरफ़ भाग कर आया हूँ और तेरे सामने खड़ा हूँ इस हाल में कि मैं तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ, तुझसे मिन्नत कर रहा हूँ और उस अज्र की उम्मीद लगाए हुए हूँ जो तू मेरे लिए रखता है और तू जानता है जो कुछ मेरे दिल में है और मेरी ज़रूरतों से बाख़बर है और मेरी हर छुपी हुई हालत से वाक़िफ़ है
और मेरे हालात के तमाम उतार-चढ़ाव और ठहराव तुझसे पोशीदा नहीं और जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ और जो दुआएँ मैं ज़बान पर लाना चाहता हूँ और जो उम्मीदें मैं अपने आख़िरी अंजाम के लिए रखता हूँ — सब तुझे मालूम हैं और ऐ मेरे मालिक! तेरे तय किए हुए फ़ैसले मेरी ज़िंदगी के आख़िर तक मेरे तमाम छुपे और ज़ाहिर मामलों में जारी रहेंगे और मेरी ज़िंदगी का बढ़ना, घटना, फ़ायदा और नुक़सान सब तेरे ही हाथ में है, किसी और के हाथ में नहीं
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे रोक ले तो फिर कौन मुझे रोज़ी देगा? और अगर तू मुझे छोड़ दे तो फिर कौन मेरी मदद करेगा?
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरे ग़ज़ब से और तेरी नाराज़गी का हक़दार बनने से तेरी पनाह चाहता हूँ
ऐ मेरे माबूद! अगर मैं तेरी रहमत के क़ाबिल नहीं हूँ तो भी तू अपनी वसीअ रहमत से मुझ पर करम करने के क़ाबिल है
ऐ मेरे माबूद! ऐसा लगता है जैसे मैं तेरे सामने खड़ा हूँ और तुझ पर मेरा पूरा भरोसा और यक़ीन मुझ पर साया किए हुए है तो तूने वही किया जो तेरी शान के लायक़ था और मुझे अपनी माफ़ी में ढाँप लिया
ऐ मेरे माबूद! अगर तू माफ़ कर दे तो तुझसे बढ़कर माफ़ करने वाला कौन है? और अगर मेरी मौत क़रीब आ गई हो और मेरे आमाल मुझे तेरे क़रीब न ला सके हों तो मैं अपने गुनाहों का इक़रार तेरी बारगाह में वसीला बनाता हूँ
ऐ मेरे माबूद! मैंने अपनी नफ़्स पर ज़ुल्म किया और अगर तू उसे माफ़ न करे तो यक़ीनन वह हलाक हो जाएगी
ऐ मेरे माबूद! तू मेरी पूरी ज़िंदगी मुझ पर मेहरबान रहा तो मेरी मौत के वक़्त भी अपनी नेमत मुझसे मत छीन
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी मेहरबानी से मौत के बाद कैसे मायूस हो सकता हूँ जबकि तूने मेरी ज़िंदगी में मेरे साथ सिवाए भलाई के कुछ नहीं किया
ऐ मेरे माबूद! मेरे मामलों को उसी तरह सँभाल जैसा तेरी शान के मुताबिक़ है और अपनी रहमत से उस गुनाहगार पर मेहर फ़रमा जिसे उसकी नादानी ने घेर लिया है
ऐ मेरे माबूद! तूने दुनिया में मेरे गुनाहों पर पर्दा डाला जबकि आख़िरत में मुझे उस पर्दे की और भी ज़्यादा ज़रूरत है
जब तूने उन्हें अपने नेक बन्दों पर भी ज़ाहिर नहीं किया तो क़यामत के दिन तमाम देखने वालों के सामने मुझे रुस्वा न करना
ऐ मेरे माबूद! तेरी सख़ावत ने मेरी उम्मीदें बढ़ा दी हैं और तेरी माफ़ी मेरे आमाल से कहीं बेहतर है
ऐ मेरे माबूद! उस दिन जब तू अपने बन्दों के बीच फ़ैसला करेगा मुझे अपनी मुलाक़ात से ख़ुश कर देना
ऐ मेरे माबूद! मेरी माफ़ी की दरख़्वास्त उस शख़्स की दरख़्वास्त है जो अपनी माफ़ी क़बूल हुए बिना रह नहीं सकता तो ऐ सबसे ज़्यादा इज़्ज़त देने वाले! मेरी माफ़ी क़बूल फ़रमा
ऐ मेरे माबूद! मेरी दुआ रद्द न करना मेरी उम्मीद को तोड़ना मत और मुझसे अपनी रहमत की उम्मीद मत छीन
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे रुस्वा करना चाहता तो मुझे हिदायत न देता और अगर तू मुझे ज़लील करना चाहता तो मुझे आफ़ियत न देता
ऐ मेरे माबूद! मैं यह गुमान नहीं करता कि तू मेरी वह दुआ ठुकरा देगा जिसके लिए मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी तुझसे माँगते गुज़ार दी
ऐ मेरे माबूद! सारी हम्द हमेशा-हमेशा हमेशा रहने वाली, कभी ख़त्म न होने वाली तेरे ही लिए है जिस तरह तू पसंद करता है और राज़ी होता है
ऐ मेरे माबूद! अगर तू मुझे मेरे गुनाहों पर पकड़ ले तो मैं तेरी माफ़ी को थाम लूँगा और अगर तू मुझे मेरे कसूरों पर सज़ा दे तो मैं तेरी मग़फ़िरत से लिपट जाऊँगा
और अगर तू मुझे जहन्नम में डाल दे तो मैं उसके रहने वालों से ऐलान कर दूँगा कि मैं तुझसे मोहब्बत करता हूँ
ऐ मेरे माबूद! अगर मेरे आमाल तेरी इताअत के मुक़ाबले में कम हैं तो मेरी उम्मीदें तुझसे बहुत बुलंद हैं
ऐ मेरे माबूद! मैं तुझसे नाकाम होकर कैसे लौट सकता हूँ जबकि तेरी सख़ावत पर मेरा अच्छा गुमान मुझे कामयाबी और रहमत की उम्मीद देता है
ऐ मेरे माबूद! मैंने अपनी ज़िंदगी तुझसे ग़ाफ़िल रहने की लालच में गंवा दी और अपनी जवानी तुझसे दूर रहने की मदहोशी में ज़ाया कर दी
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल रहा और तेरी नाराज़गी के रास्ते पर चलता रहा
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरा बन्दہ हूँ तेरे बन्दे का बेटा हूँ तेरे सामने खड़ा हूँ तेरी सख़ावत का वसीला देकर तुझसे सिफ़ारिश करता हूँ
ऐ मेरे माबूद! मैं वह बन्दा हूँ जो अपनी बेशर्मी और तेरी निगरानी की परवाह न करने पर तुझसे माफ़ी चाहता है और तुझसे बख़्शिश माँगता है क्योंकि माफ़ करना तेरी सख़ावत की पहचान है
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शाबान की दूसरी रात – रसूलुल्लाह ﷺ (उन पर और उनकी आल पर दुरूद व सलाम हो) से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की दूसरी रात
50 (25×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा, सूरह इख़लास, सूरह नास और सूरह फ़लक़ एक-एक बार पढ़े,
अल्लाह किरामन कातिबीन को हुक्म देगा कि एक साल तक उस बन्दे के गुनाह न लिखें। अल्लाह उसे ज़मीन और आसमान के इबादत करने वालों के सवाब में हिस्सा देगा। और उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबूवत के लिए मुक़र्रर किया, बदनसीब, मुनाफ़िक़ और फ़ासिक़ के सिवा कोई भी इस रात ज़िक्र से महरूम नहीं रहता।
शाबान की तीसरी रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की तीसरी रात
2 रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह इख़लास 25 बार पढ़े,
अल्लाह क़यामत के दिन उसके लिए जन्नत के आठ दरवाज़े खोलेगा, जहन्नम के सात दरवाज़े बंद करेगा और उसे हज़ार लिबास और हज़ार ताज पहनाएगा।
शाबान का तीसरा दिन
शाबान की चौथी रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की चौथी रात
40 (20×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह इख़लास 25 बार पढ़े,
अल्लाह हर रकअत पर दस लाख साल की इबादत का सवाब लिखेगा, हर सूरह पर दस लाख बस्तियाँ बनाएगा और दस लाख शहीदों का सवाब अता करेगा।
शाबान की पाँचवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की पाँचवीं रात
2 रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह इख़लास 500 बार पढ़े और नमाज़ पूरी करने के बाद 70 बार सलवात पढ़े,
अल्लाह दुनिया और आख़िरत की उसकी हज़ार हाजतें पूरी करेगा और उसे जन्नत में आसमान के सितारों के बराबर शहर अता करेगा।
शाबान की छठी रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की छठी रात
4 (2×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह इख़लास 50 बार पढ़े,
अल्लाह उसकी मौत बरकत के साथ देगा, उसकी क़ब्र को वसीअ करेगा और उसे क़ब्र से चाँद की तरह रोशन चेहरे के साथ उठाएगा। वह कहेगा: मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं।
शाबान की सातवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की सातवीं रात 2 रकअत नमाज़ अदा करे, पहली रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह इख़लास 100 बार, और दूसरी रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और आयतुल कुर्सी 100 बार पढ़े,
अल्लाह हर मोमिन मर्द और औरत की दुआ क़ुबूल करेगा और उनकी ज़रूरतें पूरी करेगा। हर दिन शहीद का सवाब लिखा जाएगा और कोई गुनाह बाक़ी नहीं रहेगा।
शाबान की आठवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की आठवीं रात
2 रकअत नमाज़ अदा करे, पहली रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह कहफ़ आयत 110 पाँच बार तथा सूरह इख़लास 15 बार, और दूसरी रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह बक़रा आयत 285 व 286 एक बार तथा सूरह इख़लास 15 बार पढ़े,
अल्लाह उसे पाक हालत में दुनिया से उठाएगा, चाहे उसके गुनाह समुंदर की झाग से भी ज़्यादा हों। ऐसा होगा जैसे उसने तौरेत, इंजील, ज़बूर और क़ुरआन पढ़ लिया हो।
शाबान की नौवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की नौवीं रात
4 (2×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह नसर दस बार पढ़े,
अल्लाह उसके जिस्म को आग से महफूज़ रखेगा और उसे जंगे बद्र के बारह शहीदों का सवाब तथा हर आयत पर उलमा का सवाब अता करेगा।
शाबान की दसवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की दसवीं रात
4 (2×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार, आयतुल कुर्सी एक बार और सूरह कौसर तीन बार पढ़े,
अल्लाह फरिश्तों से फ़रमाएगा: इसके लिए एक लाख नेकियाँ लिखो, इसके दर्जे एक लाख बढ़ाओ और इसके लिए एक लाख दरवाज़े खोल दो।
शाबान की ग्यारहवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की ग्यारहवीं रात
8 (4×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह काफ़िरून दस बार पढ़े,
उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबूवत दी, यह नमाज़ सिर्फ़ मुकम्मल ईमान वाले मोमिन ही अदा करेंगे। हर रकअत पर अल्लाह उसे जन्नत का एक बाग़ अता करेगा।
शाबान की बारहवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की बारहवीं रात
12 (6×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह तकासुर दस बार पढ़े,
अल्लाह उसके चालीस साल के गुनाह माफ़ करेगा, उसके दर्जे चालीस बढ़ाएगा, चालीस हज़ार फ़रिश्ते उसके लिए मग़फ़िरत माँगेंगे और उसे लैलतुल क़द्र का सवाब मिलेगा।
शाबान की तेरहवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की तेरहवीं रात
2 रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह तिन एक बार पढ़े,
ऐसा होगा जैसे उसने हज़रत इस्माईल ﷺ की औलाद में से दो सौ गुलाम आज़ाद किए हों। उसके गुनाह इस तरह मिटा दिए जाएँगे जैसे वह आज ही पैदा हुआ हो। अल्लाह उसे आग से अमान देगा और मुहम्मद ﷺ व इब्राहीम ﷺ की संगत अता करेगा।
शाबान की चौदहवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की चौदहवीं रात 4 (2×2) रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा एक बार और सूरह असर पाँच बार पढ़े,
क़यामत के दिन उसका चेहरा चाँद और सूरज से ज़्यादा रोशन होगा और उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
शाबान की पंद्रहवीं रात
शाबान की सोलहवीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की सोलहवीं रात
2 रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा और आयतुल कुर्सी एक-एक बार तथा सूरह इख़लास 15 बार पढ़े,
अल्लाह फ़रमाता है: मैं उसे वही सवाब अता करूँगा जो मैंने तुम्हें नबूवत के लिए दिया है और उसके लिए जन्नत में हज़ार महल बनाऊँगा।
शाबान की 17वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है (उन पर और उनके अहले बैत पर दरूद व सलाम हो): जो शख़्स शाबान की सत्रहवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 71 बार सूरह इख़लास पढ़े, और नमाज़ के बाद 70 बार अल्लाह से मग़फिरत मांगे,
अल्लाह तआला उसके उठने से पहले ही उसे बख़्श देता है और उसके नामे-आमाल में कोई गुनाह दर्ज नहीं किया जाता।
शाबान की 18वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की अठारहवीं रात को
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 5 बार सूरह इख़लास पढ़े,
अल्लाह तआला इस रात मांगी गई तमाम हाजतें पूरी करता है, अगर उसकी तक़दीर बदनसीब हो तो उसे खुशनसीब कर देता है, और अगर अगले साल से पहले उसका इंतक़ाल हो जाए तो उसे शहादत का दर्जा अता करता है।
शाबान की 19वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की उन्नीसवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह आले-इमरान की आयत 26 और 27 को 5 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसके पिछले और आने वाले तमाम गुनाह माफ़ फरमा देता है, और आइंदा की तमाम दुआएं क़बूल करता है। अगर उसके वालिदैन जहन्नम में हों तो अल्लाह उन्हें भी निकाल लेता है।
शाबान की 20वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की बीसवीं रात को
4 रकअत (2×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र 15 बार पढ़े,
उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबी बनाकर भेजा, वह शख़्स इस दुनिया से उस वक़्त तक नहीं जाएगा जब तक जन्नत में अपनी जगह ख़्वाब में न देख ले, और क़यामत के दिन उसे अज़ीम लोगों के साथ उठाया जाएगा।
शाबान की 21वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की इक्कीसवीं रात को
8 रकअत (4×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा, और एक-एक बार सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़ और सूरह नास पढ़े,
आसमान के सितारों के बराबर नेकियाँ लिखी जाती हैं और उसका दर्जा बुलंद किया जाता है।
शाबान की 22वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की बाइसवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 15 बार सूरह काफ़िरून पढ़े,
अल्लाह तआला उसका नाम सच्चों में दर्ज करता है, उसे रसूलों की संगत नसीब होती है और वह महफ़ूज़ रहता है।
शाबान की 23वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की तेईसवीं रात को
30 रकअत (15×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र एक बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसके दिल से हर तरह का धोखा निकाल देता है और वह उन लोगों में शामिल हो जाता है जिनके दिल इस्लाम के शुरुआती दौर में वसीअ किए गए थे। क़यामत के दिन उसे पूरे चांद की तरह चमकते चेहरे के साथ उठाया जाएगा।
शाबान की 24वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की चौबीसवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र 10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसे जहन्नम से आज़ादी देता है, क़ब्र के अज़ाब से बचाता है, आसान हिसाब देता है, और आदम, नूह, तमाम अंबिया की ज़ियारत और शफ़ाअत अता करता है।
शाबान की 25वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की पच्चीसवीं रात को
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और एक बार सूरह तकासुर पढ़े,
अल्लाह तआला उसे नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने वालों का सवाब अता करता है और सत्तर नबियों का अज्र भी देता है।
शाबान की 26वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की छब्बीसवीं रात को
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह बक़रह की आयत 285 और 286 10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसे दुनिया की आफ़तों से महफ़ूज़ रखता है और क़यामत के दिन उसे नूर की छह किरणें अता करता है।
शाबान की 27वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की सत्ताइसवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह आला 10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसके लिए दस लाख नेकियाँ लिखता है, दस लाख गुनाह मिटाता है, दस लाख दर्जे बुलंद करता है और उसे नूर का ताज पहनाता है।
शाबान की 28वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की अट्ठाइसवीं रात को
4 रकअत (2×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह इख़लास, सूरह नास और सूरह फ़लक़ एक-एक बार पढ़े,
क़यामत के दिन उसका चेहरा पूरे चांद की तरह चमकेगा और क़यामत की तमाम मुश्किलें उससे दूर कर दी जाएंगी।
शाबान की 29वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की उनतीसवीं रात को
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह तकासुर, सूरह नास, सूरह फ़लक़ और सूरह इख़लास 10-10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसे ख़ास इबादत करने वालों का सवाब देता है, उसके आमाल के तराज़ू में बढ़ोतरी करता है, हिसाब में आसानी देता है और वह पुल सिरात को बिजली की तरह पार करता है।
शाबान की 30वीं रात – रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है: जो शख़्स शाबान की तीसवीं रात को
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह आला 10 बार पढ़े, और नमाज़ के बाद नबी ﷺ पर 100 बार दरूद भेजे,
उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबूवत दी, अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत में दस लाख शहर बनाता है, और अगर आसमान व ज़मीन के तमाम बाशिंदे जमा हो जाएं तब भी उसके अज्र को गिन नहीं सकते। अल्लाह उसकी एक हज़ार हाजतें भी पूरी करता है।
2 रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह फ़ातिहा और आयतुल कुर्सी एक-एक बार तथा सूरह इख़लास 15 बार पढ़े,
अल्लाह फ़रमाता है: मैं उसे वही सवाब अता करूँगा जो मैंने तुम्हें नबूवत के लिए दिया है और उसके लिए जन्नत में हज़ार महल बनाऊँगा।
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 71 बार सूरह इख़लास पढ़े, और नमाज़ के बाद 70 बार अल्लाह से मग़फिरत मांगे,
अल्लाह तआला उसके उठने से पहले ही उसे बख़्श देता है और उसके नामे-आमाल में कोई गुनाह दर्ज नहीं किया जाता।
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 5 बार सूरह इख़लास पढ़े,
अल्लाह तआला इस रात मांगी गई तमाम हाजतें पूरी करता है, अगर उसकी तक़दीर बदनसीब हो तो उसे खुशनसीब कर देता है, और अगर अगले साल से पहले उसका इंतक़ाल हो जाए तो उसे शहादत का दर्जा अता करता है।
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह आले-इमरान की आयत 26 और 27 को 5 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसके पिछले और आने वाले तमाम गुनाह माफ़ फरमा देता है, और आइंदा की तमाम दुआएं क़बूल करता है। अगर उसके वालिदैन जहन्नम में हों तो अल्लाह उन्हें भी निकाल लेता है।
4 रकअत (2×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र 15 बार पढ़े,
उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबी बनाकर भेजा, वह शख़्स इस दुनिया से उस वक़्त तक नहीं जाएगा जब तक जन्नत में अपनी जगह ख़्वाब में न देख ले, और क़यामत के दिन उसे अज़ीम लोगों के साथ उठाया जाएगा।
8 रकअत (4×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा, और एक-एक बार सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़ और सूरह नास पढ़े,
आसमान के सितारों के बराबर नेकियाँ लिखी जाती हैं और उसका दर्जा बुलंद किया जाता है।
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और 15 बार सूरह काफ़िरून पढ़े,
अल्लाह तआला उसका नाम सच्चों में दर्ज करता है, उसे रसूलों की संगत नसीब होती है और वह महफ़ूज़ रहता है।
30 रकअत (15×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र एक बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसके दिल से हर तरह का धोखा निकाल देता है और वह उन लोगों में शामिल हो जाता है जिनके दिल इस्लाम के शुरुआती दौर में वसीअ किए गए थे। क़यामत के दिन उसे पूरे चांद की तरह चमकते चेहरे के साथ उठाया जाएगा।
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह नस्र 10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसे जहन्नम से आज़ादी देता है, क़ब्र के अज़ाब से बचाता है, आसान हिसाब देता है, और आदम, नूह, तमाम अंबिया की ज़ियारत और शफ़ाअत अता करता है।
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और एक बार सूरह तकासुर पढ़े,
अल्लाह तआला उसे नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने वालों का सवाब अता करता है और सत्तर नबियों का अज्र भी देता है।
4 रकअत (2×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह इख़लास, सूरह नास और सूरह फ़लक़ एक-एक बार पढ़े,
क़यामत के दिन उसका चेहरा पूरे चांद की तरह चमकेगा और क़यामत की तमाम मुश्किलें उससे दूर कर दी जाएंगी।
10 रकअत (5×2) नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह तकासुर, सूरह नास, सूरह फ़लक़ और सूरह इख़लास 10-10 बार पढ़े,
अल्लाह तआला उसे ख़ास इबादत करने वालों का सवाब देता है, उसके आमाल के तराज़ू में बढ़ोतरी करता है, हिसाब में आसानी देता है और वह पुल सिरात को बिजली की तरह पार करता है।
2 रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक बार सूरह फ़ातिहा और सूरह आला 10 बार पढ़े, और नमाज़ के बाद नबी ﷺ पर 100 बार दरूद भेजे,
उस ज़ात की क़सम जिसने मुझे नबूवत दी, अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत में दस लाख शहर बनाता है, और अगर आसमान व ज़मीन के तमाम बाशिंदे जमा हो जाएं तब भी उसके अज्र को गिन नहीं सकते। अल्लाह उसकी एक हज़ार हाजतें भी पूरी करता है।
इमाम अली रज़ा (अ.) (उयून अख़बार अर-रज़ा, जिल्द 2) से रिवायत है,
“जो शख़्स शाबान के आख़िरी तीन दिन रोज़ा रखे और उसे रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़ों से मिला दे, तो अल्लाह तआला उसके लिए दो महीने लगातार रोज़ा रखने का सवाब तय कर देता है।”
अबू-सल्त अल-हरवी बयान करते हैं कि जब वह शाबान के आख़िरी जुमे को इमाम अली रज़ा (अ.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो इमाम ने फ़रमाया: “ऐ अबू-सल्त! शाबान का ज़्यादातर हिस्सा गुज़र चुका है और यह उसका आख़िरी जुमआ है। अब इस महीने में जो कमी रह गई है, उसे पूरा करने की कोशिश करो। दुआ करो, अल्लाह तआला से मग़फिरत माँगो, क़ुरआन की तिलावत करो, और अपने गुनाहों से तौबा करो ताकि रमज़ान के महीने में ख़ालिस इख़लास के साथ दाख़िल हो सको।
तुम पर जो भी अमानतें बाक़ी हैं उन्हें अदा करो, अपने किसी मोमिन भाई के लिए दिल में कीना न रखो, और हर गुनाह को छोड़ दो।
अल्लाह तआला से डरते रहो और ज़ाहिर व बातिन में उसी पर भरोसा रखो, क्योंकि ‘जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी है। अल्लाह अपने काम को पूरा करने वाला है, और उसने हर चीज़ के लिए एक मिक़दार मुक़र्रर कर रखी है।’ (65:3)
शाबान के बाक़ी दिनों में नीचे दी गई दुआ को ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ो, क्योंकि इस मुबारक महीने की बरकत से अल्लाह बहुत से लोगों को जहन्नम से आज़ादी देता है:
اللّهُمَّ إنْ لَمْ تَكُنْ غَفَرْتَ لَنَا فِيمَا مَضَى مِنْ شَعْبَانَ
अल्लाहुम्मा इन लम् तकुन ग़फ़रता लना फ़ीमा मज़ा मिन शाबान
ऐ अल्लाह! अगर तूने शाबान के गुज़रे हुए दिनों में हमें नहीं बख़्शा,
فَاغْفِرْ لَنَا فِيمَا بَقِيَ مِنْهُ.
फ़ग़फ़िर लना फ़ीमा बक़िया मिन्हु
तो इसके बाक़ी बचे हुए दिनों में हमें बख़्श दे।
शाबान का जुमआ – शाबान महीने को कैसे पूरा किया जाए कई रिवायतों में बयान हुआ है कि हर महीने के आमाल उसके आख़िरी जुमे को अल्लाह की बारगाह में पेश किए जाते हैं। इसलिए शाबान के आख़िरी जुमे से पहले अपने दिल और नीयत को पाक करने की कोशिश करो, क्योंकि आमाल की क़ीमत नीयत पर होती है।
जो नेक आमाल छूट गए हों, उनकी भरपाई करने की कोशिश करो और उन्हें इस तरह अल्लाह की बारगाह में पेश करो जैसे कोई डरता हुआ बंदा, जिसे अपने आमाल के रद्द हो जाने का ख़ौफ़ हो।
अगर हमें अपनी दुनियावी मुरादें पूरी होने पर या दुनियावी लज़्ज़तों में ज़्यादा ख़ुशी महसूस हो, और अल्लाह की क़ुर्बत, इबादत और इताअत में उससे कम, तो यह हमारे आमाल की कमज़ोरी की निशानी है। यह रूहानी बीमारी की साफ़ अलामत है और ऐसे आमाल में नुख़्स होना तय है।
इस बात पर भी ध्यान दो कि अपने आमाल रहमत वाले अल्लाह से सवाब पाने की नीयत से उन हस्तियों की ख़िदमत में पेश करो जिन पर आख़िरी जुमे को सबके आमाल पेश किए जाते हैं ((अहले-बैत अ.))।
इसलिए शाबान के आख़िरी जुमे को अपने आमाल उन्हें पेश करो, ताकि रहमान अल्लाह से अज्र हासिल हो। अपने आमाल इस तरह पेश करो जैसे कोई मेहमान, इबादतगुज़ार और फ़रार किया हुआ बंदा, जो अपने नफ़्स और उसकी ख़्वाहिशों से भागकर अपने मौला के अद्ल, जलाल और रहमत की पनाह में आया हो।
इस महीने के हर हिस्से में एहतियात के साथ आमाल पेश करते रहो, सिर्फ़ आख़िरी जुमे पर ही नहीं।
Source Iqbal Aamal - Syed ibn tawus
आख़िरी रात की दुआ
रमज़ान का महीना
“जो शख़्स शाबान के आख़िरी तीन दिन रोज़ा रखे और उसे रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़ों से मिला दे, तो अल्लाह तआला उसके लिए दो महीने लगातार रोज़ा रखने का सवाब तय कर देता है।”
अबू-सल्त अल-हरवी बयान करते हैं कि जब वह शाबान के आख़िरी जुमे को इमाम अली रज़ा (अ.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो इमाम ने फ़रमाया: “ऐ अबू-सल्त! शाबान का ज़्यादातर हिस्सा गुज़र चुका है और यह उसका आख़िरी जुमआ है। अब इस महीने में जो कमी रह गई है, उसे पूरा करने की कोशिश करो। दुआ करो, अल्लाह तआला से मग़फिरत माँगो, क़ुरआन की तिलावत करो, और अपने गुनाहों से तौबा करो ताकि रमज़ान के महीने में ख़ालिस इख़लास के साथ दाख़िल हो सको।
तुम पर जो भी अमानतें बाक़ी हैं उन्हें अदा करो, अपने किसी मोमिन भाई के लिए दिल में कीना न रखो, और हर गुनाह को छोड़ दो।
अल्लाह तआला से डरते रहो और ज़ाहिर व बातिन में उसी पर भरोसा रखो, क्योंकि ‘जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी है। अल्लाह अपने काम को पूरा करने वाला है, और उसने हर चीज़ के लिए एक मिक़दार मुक़र्रर कर रखी है।’ (65:3)
शाबान के बाक़ी दिनों में नीचे दी गई दुआ को ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ो, क्योंकि इस मुबारक महीने की बरकत से अल्लाह बहुत से लोगों को जहन्नम से आज़ादी देता है:
शाबान का जुमआ – शाबान महीने को कैसे पूरा किया जाए कई रिवायतों में बयान हुआ है कि हर महीने के आमाल उसके आख़िरी जुमे को अल्लाह की बारगाह में पेश किए जाते हैं। इसलिए शाबान के आख़िरी जुमे से पहले अपने दिल और नीयत को पाक करने की कोशिश करो, क्योंकि आमाल की क़ीमत नीयत पर होती है।
जो नेक आमाल छूट गए हों, उनकी भरपाई करने की कोशिश करो और उन्हें इस तरह अल्लाह की बारगाह में पेश करो जैसे कोई डरता हुआ बंदा, जिसे अपने आमाल के रद्द हो जाने का ख़ौफ़ हो।
अगर हमें अपनी दुनियावी मुरादें पूरी होने पर या दुनियावी लज़्ज़तों में ज़्यादा ख़ुशी महसूस हो, और अल्लाह की क़ुर्बत, इबादत और इताअत में उससे कम, तो यह हमारे आमाल की कमज़ोरी की निशानी है। यह रूहानी बीमारी की साफ़ अलामत है और ऐसे आमाल में नुख़्स होना तय है।
इस बात पर भी ध्यान दो कि अपने आमाल रहमत वाले अल्लाह से सवाब पाने की नीयत से उन हस्तियों की ख़िदमत में पेश करो जिन पर आख़िरी जुमे को सबके आमाल पेश किए जाते हैं ((अहले-बैत अ.))।
इसलिए शाबान के आख़िरी जुमे को अपने आमाल उन्हें पेश करो, ताकि रहमान अल्लाह से अज्र हासिल हो। अपने आमाल इस तरह पेश करो जैसे कोई मेहमान, इबादतगुज़ार और फ़रार किया हुआ बंदा, जो अपने नफ़्स और उसकी ख़्वाहिशों से भागकर अपने मौला के अद्ल, जलाल और रहमत की पनाह में आया हो।
इस महीने के हर हिस्से में एहतियात के साथ आमाल पेश करते रहो, सिर्फ़ आख़िरी जुमे पर ही नहीं।
Source Iqbal Aamal - Syed ibn tawus
आख़िरी रात की दुआ
रमज़ान का महीना