शाबान की पहली
माहे शाबान की पहली रात / पहले दिन के आमाल माहे शाबान का फ़ेहरिस्त
अहमियत

शाबान की पहली तारीख के लिए दुआ और आमाल
शाबान की बरकतें और पहली तारीख की अहमियत – इक़बाल-उल-आमाल पीडीएफ़
शाबान की नियमित दुआओं की इब्तिदा करें

रोज़ा रखें. यह बहुत फ़ज़ीलत वाला दिन है और हज़रत जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत है कि जो शख़्स इस दिन रोज़ा रखे, उसके लिए जन्नत की ज़मानत है।

ग़ुस्ल करें
नए महीने के आमाल

पहली रात:
“इक़बाल आमाल” में बहुत-सी नमाज़ें बयान हुई हैं जिनका सवाब बहुत ज़्यादा है :-
i) दो रकअत नमाज़ – हर रकअत में सूरह हम्द और तीन बार सूरह इख़लास फिर यह कहें:
اللهم هذا عهدي عندك إلی یوم القیامة،
अल्लाहुम्मा हाज़ा अहदी इन्दक इला यौमिल क़ियामह
ऐ अल्लाह! यह क़ियामत के दिन तक तेरे पास मेरा अहद (वादा) है

अल्लाह उसे शैतान से महफ़ूज़ रखेगा और सच्चों का सवाब अता करेगा

ii) बारह रकअत नमाज़ – हर रकअत में अल-हम्द के बाद पंद्रह बार सूरह इख़लास

iii)पहले तीन दिन रोज़ा रखें और हर रात दो रकअत नमाज़ – सूरह हम्द और ग्यारह बार सूरह इख़लास पढ़ें। सय्यद इब्ने ताउस ने रसूल-ए-ख़ुदा (स.) से रिवायत की है कि ऐसा करने वाले को बहुत बड़ा सवाब मिलेगा।

चाँद देखने की दुआ
اللَّهُمَّ إِنَّ هَذَا هِلَالُ شَهْرِ [شَعْبَانَ‌]
अल्लाहुम्मा इन्ना हाज़ा हिलालु शहरे शाबान
ऐ अल्लाह! यह शाबान के महीने का चाँद है

وَ قَدْ وَرَدَ وَ أَنْتَ أَعْلَمُ بِمَا فِيهِ مِنَ الْإِحْسَانِ فَاجْعَلْهُ
वक़द वरद वअन्ता आलमु बिमा फ़ीहि मिनल इहसान फ़जअलहु
और तू इसकी भलाई को हमसे बेहतर जानता है

اللَّهُمَّ هِلَالَ بَرَكَاتٍ وَ سَعَادَاتٍ كَامِلَةَ الْأَمَانِ وَ الْغُفْرَانِ وَ الرِّضْوَانِ وَ مَاحِيَةَ الْأَخْطَارِ فِي الْأَحْيَانِ
अल्लाहुम्मा हिलाल बरकातिं व सआदातिं कामिलतिल अमानि वल ग़ुफ़रान वल रिज़वान
ऐ अल्लाह! इसे बरकत, सलामती, मग़फ़िरत और तेरी रज़ा का ज़रिया बना

وَ الْأَزْمَانِ وَ حَامِيَةً مِنْ أَذَى أَهْلِ الْعِصْيَانِ وَ الْبُهْتَانِ
वल अज़मानि व हामियतं मिन अज़ा अहलिल इसयान वल बुहतान
और हमें गुनाहगारों और इल्ज़ाम लगाने वालों की तकलीफ़ से बचा

وَ شَرِّفْنَا بِامْتِثَالِ مَرَاسِمِهِ وَ إِحْيَاءِ مَوَاسِمِهِ وَ أَلْحِقْنَا بِشُمُولِ مَرَاحِمِهِ وَ مَكَارِمِهِ
व शर्रिफ़ना बिम्तिसालि मरासिमिही व इह्याइ मवासिमिही
हमें इसके आमाल अदा करने की तौफ़ीक़ दे और अपनी रहमत में शामिल फ़रमा

وَ طَهِّرْنَا فِيهِ تَطْهِيراً نَصْلُحُ بِهِ لِلدُّخُولِ عَلَى شَهْرِ رَمَضَانَ مُظَفَّرِينَ
व ताह्हिरना फ़ीहि ततहीरन नस्लुहु बिही लिद्दुखूलि अला शहरे रमज़ान
हमें इस महीने में ऐसा पाक कर दे कि हम रमज़ान में कामयाबी के साथ दाख़िल हों



iv) शाबान के महीने की पहली रात में 100 (सौ) रकअत नमाज़ अदा करें और हर रकअत में सूरह अल-हम्द और सूरह क़ुल हुवल्लाहु अहद एक-एक बार पढ़ें।
नमाज़ पूरी करने के बाद सूरह अल-हम्द पचास (50) बार पढ़ें।
रसूल-ए-ख़ुदा (स.) से यह रिवायत नक़्ल की गई है: “मैं उस ज़ात की क़सम खाता हूँ जिसने मुझे हक़ के साथ नबूवत पर मामूर किया कि जो बंदा यह नमाज़ अदा करे और रोज़ा भी रखे, तो अल्लाह तआला उससे आसमानों और ज़मीन के रहने वालों की बुराइयों को, शरारती जिन्नों और ज़ालिम बादशाहों के शर को दूर कर देगा। अल्लाह उसके सत्तर हज़ार बड़े गुनाह माफ़ फ़रमा देगा, क़ब्र के अज़ाब को उससे हटा देगा। मुनकर और नकीर उसे डराएँगे नहीं। उसे क़ब्र से इस हालत में उठाया जाएगा कि उसका चेहरा चौदहवीं के चाँद की तरह चमक रहा होगा। वह पुल-सिरात को बिजली की तरह पार करेगा और उसका आमालनामा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा।”




सेक्शन 11: माहे शाबान के हर जुमेरात (गुरुवार) की फ़ज़ीलत और उस दिन नमाज़ पढ़ने का बयान
यह अमल माहे शाबान की पहली तारीख़ के आमाल में शामिल बताया गया है, क्योंकि मुमकिन है कि पहली तारीख़ जुमेरात के दिन पड़े। ऐसी सूरत में यह अमल उसी दिन अदा किया जा सकता है। और अगर महीने की पहली तारीख़ जुमेरात के दिन न पड़े, तो एहतियात और ग़फ़लत से बचने के लिए इसे पहले आने वाले जुमेरात के दिन अदा करना चाहिए। हमने माहे शाबान के आमाल के सिलसिले में हमारे मौला अली इब्ने अबी तालिब (अ.) से एक बहुत ही अज़ीम और मुअज़्ज़ज़ रिवायत पाई है। आप (अ.) बयान करते हैं कि रसूल-ए-ख़ुदा (स.) ने फ़रमाया: “माहे शाबान के हर जुमेरात को आसमान सजाए जाते हैं और फ़रिश्ते कहते हैं: ‘ऐ अल्लाह! जो इस दिन रोज़ा रखे, उसे बख़्श दे और उसकी दुआओं को क़ुबूल फ़रमा।’ और जो शख़्स उस दिन दो रकअत नमाज़ अदा करे, हर रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा एक बार और ‘क़ुल हुवल्लाहु अहद’ सौ (100) बार पढ़े, और नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (स.) पर सौ (100) बार दुरूद भेजे, तो अल्लाह तआला उसकी दुनिया और आख़िरत की तमाम ज़रूरतें पूरी फ़रमा देगा। और जो शख़्स उस दिन एक रोज़ा रखे, अल्लाह तआला उसके जिस्म को जहन्नम की आग से हराम क़रार दे देगा।”
एक दूसरी रिवायत में रसूल-ए-ख़ुदा (स.) से यह भी नक़्ल किया गया है: “जो शख़्स माहे शाबान की पच्चीसवीं तारीख़ को रोज़ा रखे, अल्लाह तआला उसे बड़ा अज्र अता फ़रमाएगा। अल्लाह उसकी दुनिया की बीस (20) ज़रूरतें और आख़िरत की भी बीस (20) ज़रूरतें पूरी फ़रमा देगा।”

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सेक्शन 7 : शाबान के एक, दो या तीन दिन रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत
निम्नलिखित रिवायत हज़रत जाफ़र अस-सादिक़ (अ.) से उनके वालिद (अ.) से, उनके दादा (अ.) से, और रसूल-ए-ख़ुदा (स.) से सनद के साथ बयान की गई है: “शाबान मेरा महीना है और रमज़ान अल्लाह तआला का मुबारक और बुलंद महीना है। मैं उस शख़्स की शफ़ाअत करूँगा जो मेरे महीने में एक दिन रोज़ा रखे। जो मेरे महीने में दो दिन रोज़ा रखेगा, अल्लाह तआला उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर देगा। और जो मेरे महीने में तीन दिन रोज़ा रखेगा, उससे कहा जाएगा कि अपने आमाल नए सिरे से शुरू करो।” इसी प्रकार एक और रिवायत अबू जाफ़र मुहम्मद बिन बाबویه ने अपनी किताब “मन ला यहज़ुरुह अल-फ़क़ीह” में बयान की है, जो हसन बिन महबूब से, अब्दुल्लाह बिन हज़्म अल-अज़दी से, और अबा अब्दुल्लाह जाफ़र अस-सादिक़ (अ.) से नक़्ल है: “जो शख़्स शाबान के पहले दिन रोज़ा रखे, उसके लिए जन्नत यक़ीनी है। जो शख़्स शाबान के दो दिन रोज़ा रखे, अल्लाह तआला हर दिन उस पर नज़र-ए-करम फ़रमाता है, जब तक वह इस दुनिया में रहता है और जन्नत में भी। और जो शख़्स शाबान के तीन दिन रोज़ा रखे, वह हर रोज़ जन्नत में अर्श-ए-इलाही की ज़ियारत करेगा।” शायद “अर्श-ए-इलाही की ज़ियारत” से मुराद यह है कि वह जन्नत में अल्लाह के क़रीब रहने वालों में से होगा और उसे अल्लाह के ज़ाइरीन में शुमार किया जाएगा, जिस तरह अल्लाह तआला ने ख़ाना-ए-काबा को अपना मुबारक घर क़रार दिया है, और जो शख़्स वहाँ ज़ियारत के लिए जाता है, वह हक़ीक़त में अल्लाह की ज़ियारत करता है।


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