ज़्यारत 4- ईमाम अली (अ०स०)-रौज़े पर पढ़ी जाने वाली


मुस्तद्रक अल-वसाइल में, किताब अल-मज़ार अल-क़दीम से हमारे मौला, इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर (अलैहिस्सलाम) से ये रिवायत नक़्ल की गई है:
अल-मज़ार अल-क़दीम के मुसन्निफ़ ने बयान किया है कि ज़ियारत का ये तरीक़ा “यौम-ए-मबअस” के लिए मख़सूस है।
मैं अपने वालिद के साथ अपने दादा, अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) की क़ब्र की ज़ियारत के लिए नजफ़ गया। मेरे वालिद रोज़ा-ए-मुक़द्दस पर रुके, रोए, और यूँ फ़रमाया:
रोज़े पर दूसरी ज़ियारात


اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ أَبِي ﭐلأَئِمَّةِ وَخَلِيلِ ﭐلنُّبُوَّةِ
अस्सलामु अला अबी अल-अइम्मति व ख़लीलि अन्नुबुव्वति
इमामों के वालिद और नुबूवत के ख़लील पर सलाम,

وَﭐلْمَخْصُوصِ بِٱلأُخُوَّةِ
वल-मख़सूसी बिल-उख़ुव्वति
और उस पर सलाम जिसे ख़ुसूसी तौर पर उख़ुव्वत (भाईचारे) से नवाज़ा गया।

اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ يَعْسُوبِ ﭐلإِيـمَانِ
अस्सलामु अला यअ’सूबी अल-ईमान
ईमान के यअ’सूब (सरदार) पर सलाम,

وَميزَانِ ﭐلأَعْمَالِ
व मीज़ानि अल-अ’माल
और आमाल के मीज़ान पर,

وَسَيْفِ ذِي ﭐلْجَلاَالِ
व सैफ़ि ज़ी अल-जलाल
और ज़ुल-जलाल के सैफ़ पर सलाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ صَالِحِ ﭐلْمُؤْمِنِينَ
अस्सलामु अला सालिहि अल-मोमिनीन
मोमिनीन के सबसे सालिह (नेक) पर सलाम,

وَوَارِثِ عِلْمِ ﭐلنَّبِيِّينَ
व वारिसि इल्मि अन्नबीय्यीन
और अंबिया के इल्म के वारिस पर,

ﭐلْحَاكِمِ فِي يَوْمِ ﭐلدِّينِ
अल-हाकिमि फी यौमि अद्दीन
और यौमुद्दीन में हाकिम पर।

اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ شَجَرَةِ ﭐلتَّقْوَىٰ
अस्सलामु अला शजरति अत्तक़वा
तक़वा के दरख़्त पर सलाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ حُجَّةِ ﭐللَّهِ ﭐلْبَالِغَةِ
अस्सलामु अला हुज्जति अल्लाहि अल-बालिघ़ति
अल्लाह की मुकम्मल हुज्जत पर सलाम,

وَنِعْمَتِهِ ﭐلسَّابِغَةِ
व निय’मतिही अस्साबिघ़ति
उसकी वासिअ’ नेअमत पर,

وَنِقْمَتِهِ ﭐلدَّامِغَةِ
व निक़मतिही अद्दामिघ़ति
और उसकी दामिघ़ सज़ा पर।

اَلسَّلاَمُ عَلَىٰ ﭐلصِّرَاطِ ﭐلوَاضِحِ
अस्सलामु अला अस्सिराति अल-वाज़िह
वाज़िह सिरात पर सलाम,

وَﭐلنَّجْمِ ﭐللاَّئِحِ
वन्नज्मि अल्लाइह
और नज्म-ए-लाइह पर,

وَﭐلإِمَامِ ﭐلنَّاصِحِ
वल-इमामि अन्नासिह
और नासिह इमाम पर सलाम।

وَرَحْمَةُ ﭐللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ
व रहमतु अल्लाहि व बरकातुहू
और अल्लाह की रहमत और बरकात उन पर हों।


मेरे वालिद (अलैहिस्सलाम) ने फिर ये इज़ाफ़ा फ़रमाया:
أَنْتَ وَسيلَتِي إِلَىٰ ﭐللَّهِ وَذَريعَتِي
अंता वसीलती इला अल्लाहि व ज़रीअ’ती
तू ही मेरे लिए अल्लाह तक वसीला और मेरा ज़रिया है।

وَلِي حَقُّ مُوَالاَتِي وَتَأْمِيلِي
व ली हक्क़ु मुवालाती व तअ’मीली
और मेरी तेरी मुवालात और तुझ से उम्मीद का हक़ है।

فَكُنْ لِي شَفيعِي إِلَىٰ ﭐللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ
फ़कुन ली शफ़ीअ’ी इला अल्लाहि अज़्ज़ व जल्ल
तो मेरे लिए अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल के हज़ूर शफ़ीअ’ बन जा,

فِي ﭐلْوُقُوفِ عَلَىٰ قَضَاءِ حَاجَتِي
फ़ी अल-वुक़ूफ़ि अला क़ज़ाइ हाजती
मेरी हाजत के पूरा होने के बारे में,

وَهِيَ فَكَاكُ رَقَبَتِي مِنَ ﭐلنَّارِ
व हिया फ़काकु रक़बती मिन अन्नार
और वो ये है कि मेरी गर्दन को आग से आज़ाद कर दे।

وَﭐصْرِفْنِي فِي مَوْقِفِي هٰذَا بِٱلنُّجْحِ
वस्रिफ़नी फी मौक़िफ़ी हाज़ा बिन्नुज्हि
और मेरी इस हाज़िर हालत/मौक़िफ़ को कामयाबी के साथ तमाम कर दे,

وَبِمَا سَأَلْتُهُ كُلَّهِ بِرَحْمَتِهِ وَقُدْرَتِهِ
व बिमा सअ’ल्तुहू कुल्लहू बिरहमतिही व क़ुदरतिही
और जो कुछ मैंने माँगा है सब अता फ़रमा—उसकी रहमत और क़ुदरत से।

اَللَّهُمَّ ﭐرْزُقْنِي عَقْلاً كَامِلاً
अल्लाहुम्मा अरज़ुक़नी अ’क़्लन कामिलन
ऐ अल्लाह! मुझे मुकम्मल अ’क़्ल अता फ़रमा,

وَلُبَّا رَاجِحاً
व लुब्बन राजिहन
और पाकीज़ा व बरतर समझ/दानाई,

وَقَلْباً زَكِيّاً
व क़ल्बन ज़किय्यन
और ज़की दिल,

وَعَمَلاً كَثيراً
व अ’मलन कसीरन
और बहुत सा नेक अमल,

وَأَدَباً بَارِعاً
व अदबन बारिअ’न
और उम्दा अदब,

وَﭐجْعَلْ ذٰلِكَ كُلَّهُ لِي
वजअ’ल ज़ालिका कुल्लहू ली
और ये सब मेरे हक़ में कर दे,

وَلاَ تَجْعَلْهُ عَلَيَّ
व ला तजअ’ल्हू अ’लय्य
और इसे मेरे ख़िलाफ़ न कर,

بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ ﭐلرَّاحِمينَ
बिरहमतिका या अरहमा अर्राहिमीन
तेरी रहमत के वासिते, ऐ सबसे बढ़कर रहम करने वाला!