“अगर कोई शाबान के आख़िरी तीन दिनों में रोज़ा रखे और उसे माहे रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़ों से मिला दे, तो अल्लाह तआला उसके लिए दो महीनों के मुसलसल रोज़ों का सवाब मुक़र्रर फ़रमाता है।”
अबुल-सल्त अल-हरवी रिवायत करते हैं कि जब उन्होंने शाबान के आख़िरी जुमे को इमाम अल-रिज़ा (अ.स) की ज़ियारत की, तो इमाम ने फ़रमाया: “अबुल-सल्त! शाबान का ज़्यादातर हिस्सा गुज़र चुका है। यह उसका आख़िरी जुमआ है। जो कुछ इस महीने में छूट गया है, उसे बाक़ी दिनों में मेहनत करके पूरा करो। ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करो, इस्तिग़फ़ार करो, कुरआन करीम की तिलावत करो, और अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करो, ताकि रमज़ान का महीना ख़ालिस नियत के साथ हासिल हो।
तुम पर लाज़िम है कि अमानतें अदा करो, और किसी मोमिन भाई के खिलाफ़ दिल में कीना न रखो, और हर गुनाह को छोड़ दो।
अल्लाह से ख़ौफ़ रखो और उस पर जाहिर व बातिन में भरोसा करो, क्योंकि “जो कोई अल्लाह पर भरोसा करे, तो वह उसके लिए काफ़ी है। बेशक अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ के लिए एक अंदाज़ा मुक़र्रर कर रखा है। 65/3”
शाबान के बाक़ी दिनों में इस दुआ को बहुत ज़्यादा पढ़ो, क्योंकि इस महीने की बरकत से अल्लाह बहुत से लोगों को जहन्नम से निजात देता है:
शाबान का जुमेरात – शाबान महीने का ख़ातिमा कैसे करें
कई रिवायतों में आया है कि हर महीने के आख़िरी जुमेरात को इंसान के आमाल अल्लाह की बारगाह में पेश किए जाते हैं।
इसलिए बेहतर है कि तुम अपने दिल और नियत को पाक करो, क्योंकि आमाल की क़ीमत इंसान की नियत पर मुनहसर है।
जो अमल रह गए हों, उन्हें पूरा करने की कोशिश करो और उन्हें इस तरह पेश करो जैसे कोई बंदा अपने आमाल के क़ुबूल न होने से डरता हो।
अगर हमें दुनियावी चीज़ें मिलने पर ज़्यादा खुशी होती है, या जब हमारी अस्थायी ज़रूरतें पूरी होती हैं, तो हम ज़्यादा राज़ी होते हैं, बनिस्बत इसके कि हम अल्लाह की इताअत और बंदगी करें,
तो यह हमारे आमाल की कमी की निशानी है।
यह एक रूहानी बीमारी की अलामत है और ऐसे आमाल में खामी होना मुमकिन है।
ध्यान रखो कि अपने आमाल को रहमान की रज़ा के लिए उन हस्तियों की बारगाह में पेश करो ( अहलुलबैत (अ.स) ) जिनके सामने शाबान के आख़िरी जुमेरात को सबके आमाल पेश किए जाते हैं।
अपने आमाल को इस तरह पेश करो जैसे कोई मेहमान, इबादतगुज़ार, गुनाहों से भागने वाला बंदा, जो अपने मालिक की पनाह में आता है और उसकी अज़मत और करम से लिपट जाता है।
माख़ज़: इक़बालुल आमाल – सैय्यद इब्न तावूस
हर जुमेरात
रोज़ा रखना बहुत ज़्यादा मुस्तहब है।
2 रकअत नमाज़ अदा करें। हर रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा के बाद सूरह अल-इख़्लास 100 मर्तबा पढ़ें।
सलाम के बाद 100 मर्तबा सलवात पढ़ें
अल्लाह तआला दुनिया से मुतअल्लिक 20 हाजतें और आख़िरत से मुतअल्लिक 20 हाजतें पूरी फ़रमाता है,
रिवायतों में आया है कि शाबान के हर जुमेरात को आसमानों को सजाया जाता है और फ़रिश्ते अल्लाह से इल्तिज़ा करते हैं कि जो लोग इस दिन रोज़ा रखें उनके गुनाह माफ़ फ़रमाए और उनकी दुआएँ क़ुबूल फ़रमाए।
हर जुमआ को शाबान में ज़ियारत जामिआ कबीरा पढ़ें (मदरसतुल क़ाइम, आयत क़ाज़ी तबातबाई के मुताबिक जो इर्फ़ानियत के उस्ताद थे इमाम ख़ुमैनी के)।
अलग सफ़हा
रमज़ान महीने की पहली रात के आमाल
शैख़ अल-तूसी ने हारिस इब्न मुगीरा अल-नदरी की रिवायत से नक़्ल किया है कि इमाम अल-सादिक (अलैहिस्सलाम) शाबान की आख़िरी रात और रमज़ान की पहली रात को यह दुआ पढ़ा करते थे
اَللَّهُمَّ إِنَّ هٰذَا ٱلشَّهْرَ ٱلْمُبَارَكَ
अल्लाहुम्मा इन्ना हाज़ा अश्शह्र अल-मुबारक
ऐ अल्लाह, यह बरकत वाला महीना
ٱلَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْآنُ
अल्लज़ी उन्ज़िला फीहिल क़ुरआन
जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया
وَجُعِلَ هُدَىً لِلنَّاسِ
व जुइला हु-दन लिन्नास
और लोगों के लिए हिदायत बनाया गया
وَبَيِّنَاتٍ مِنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ
व बय्यिनातिन मिनल हुडा वल फुरक़ान
और साफ़ निशानियाँ और हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाली किताब
قَدْ حَضَرَ
क़द हज़रा
अब आ पहुँचा है
فَسَلِّمْنَا فِيهِ
फ़सल्लिम्ना फीह
तो हमें इसमें सलामती के साथ दाख़िल कर
وَسَلَّمْهُ لَنَا
व सल्लिम्हू लना
और इसे हमारे लिए महफ़ूज़ रख
وَتَسَلَّمْهُ مِنَّا فِي يُسْرٍ مِنْكَ وَعَافِيَةٍ
व तसल्लम्हू मिन्ना फी युस्रिन मिन्का व आफियत
और इसे हमसे आसानी और आफियत के साथ क़ुबूल फ़रमा
يَا مَنْ أَخَذَ ٱلْقَلِيلَ وَشَكَرَ ٱلْكَثِيرَ
या मन अख़ज़ल क़लील व शकरल कसीर
ऐ वह जो थोड़े अमल को क़ुबूल करता है और ज़्यादा पर शुकर अदा करता है
ٱقْبَلْ مِنِّي ٱلْيَسِيرَ
इक़बल मिन्नियल यसीर
मेरे थोड़े अमल को क़ुबूल फ़रमा
اَللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे सवाल करता हूँ
أَنْ تَجْعَلَ لِي إِلَىٰ كُلِّ خَيْرٍ سَبِيلاً
अन तजअल ली इला कुल्लि ख़ैरिन सबीला
कि हर भलाई की तरफ़ मेरे लिए रास्ता बना दे
وَمِنْ كُلِّ مَا لاَ تُحِبُّ مَانِعاً
व मिन कुल्लि मा ला तुहिब्बु मानिअन
और हर उस चीज़ से रोक दे जिसे तू पसंद नहीं करता
يَا أَرْحَمَ ٱلرَّاحِمِينَ
या अरहमर राहिमीन
ऐ सब रहम करने वालों से बढ़कर रहम करने वाले
يَا مَنْ عَفَا عَنِّي وَعَمَّا خَلَوْتُ بِهِ مِنَ ٱلسَّيِّئَاتِ
या मन अफ़ा अन्नी व अम्मा खलवतु बिही मिनस सय्यिआत
ऐ वह जिसने मुझे और मेरे छुपे हुए गुनाहों को माफ़ किया
يَا مَنْ لَمْ يُؤَاخِذْنِي بِٱرْتِكَابِ ٱلْمَعَاصِي
या मन लम युआख़िज़्नी बिर्तिकाबिल मआसी
ऐ वह जिसने मुझे नाफ़रमानी पर गिरफ़्तार नहीं किया
عَفْوَكَ عَفْوَكَ عَفْوَكَ يَا كَرِيمُ
अफ़्वका अफ़्वका अफ़्वका या करीम
तेरी माफी चाहता हूँ, तेरी माफी चाहता हूँ, ऐ करम करने वाले
إِلٰهِي وَعَظْتَنِي فَلَمْ أَتَّعِظْ
इलाही वअज़तनी फ़लम अत्तअिज़
ऐ मेरे परवरदिगार, तूने नसीहत की मगर मैंने इबरत न ली
وَزَجَرْتَنِي عَنْ مَحَارِمِكَ فَلَمْ أَنْزَجِرْ
व ज़जर्तनी अन महारिमिका फ़लम अंजज़िर
और तूने मना किया मगर मैं बाज़ न आया
فَمَا عُذْرِي
फ़मा उज़्री
तो मेरा क्या उज़्र है
فَٱعْفُ عَنِّي يَا كَرِيمُ
फ़अफ़ु अन्नी या करीम
मुझे माफ़ कर दे ऐ करम करने वाले
عَفْوَكَ عَفْوَكَ
अफ़्वका अफ़्वका
तेरी माफी चाहता हूँ, तेरी माफी चाहता हूँ
اَللَّهُمَّ إِنّي أَسْأَلُكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे सवाल करता हूँ
ٱلرَّاحَةَ عِنْدَ ٱلْمَوْتِ
अर्राहता इंदल मौत
मौत के वक़्त आराम अता फ़रमा
وَٱلْعَفْوَ عِنْدَ ٱلْحِسَابِ
वल अफ़्वा इंदल हिसाब
और हिसाब के वक़्त माफी अता फ़रमा
عَظُمَ ٱلذَّنْبُ مِنْ عَبْدِكَ
अज़ुमा ज़्ज़म्बु मिन अब्दिका
तेरे बंदे का गुनाह बहुत बड़ा है
فَلْيَحْسُنِ ٱلتَّجَاوُزُ مِنْ عِنْدِكَ
फ़ल यह्सुनित्तजावुज़ु मिन इंदिका
तो तेरी तरफ़ से दरगुज़र भी बेहतरीन हो
يَا أَهْلَ ٱلتَّقْوَىٰ وَيَا أَهْلَ ٱلْمَغْفِرَةِ
या अहलत्तक़वा वा या अहलल मग़फिरह
ऐ तक़वा के मालिक और मग़फिरत के हक़दार
عَفْوَكَ عَفْوَكَ
अफ़्वका अफ़्वका
तेरी माफी चाहता हूँ, तेरी माफी चाहता हूँ
اَللَّهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ ٱبْنُ عَبْدِكَ ٱبْنُ أَمَتِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अब्दुका इब्नु अब्दिका इब्नु अमतिका
ऐ अल्लाह, मैं तेरा बंदा हूँ, तेरे बंदे का बेटा और तेरी बन्दा की औलाद हूँ
ضَعِيفٌ فَقِيرٌ إِلَىٰ رَحْمَتِكَ
ज़ईफ़ुन फ़क़ीरुन इला रहमतिका
मैं कमज़ोर और तेरी रहमत का मोहताज हूँ
وَأَنْتَ مُنْزِلُ ٱلْغِنَىٰ وَٱلْبَرَكَةِ عَلَىٰ ٱلْعِبَادِ
वा अंता मुंज़िलुल ग़िना वल बरकत अला अल इबाद
और तू अपने बंदों पर दौलत और बरकत नाज़िल करने वाला है
قَاهِرٌ مُقْتَدِرٌ
क़ाहिरुन मुक़्तदिरुन
तू ग़ालिब और क़ुदरत वाला है
أَحْصَيْتَ أَعْمَالَهُمْ
अह्सयता आमालहुम
तूने उनके आमाल गिन रखे हैं
وَقَسَمْتَ أَرْزَاقَهُمْ
वा क़सम्ता अरज़ाकहुम
और उनकी रोज़ी मुक़र्रर कर दी है
وَجَعَلْتَهُمْ مُخْتَلِفَةً أَلْسِنَتُهُمْ وَأَلْوَانُهُمْ
वा जअल्तहुम मुख़्तलिफतन अल्सिनतहुम वा अल्वानहुम
और उनकी ज़बानें और रंग अलग-अलग बनाए
خَلْقاً مِنْ بَعْدِ خَلْقٍ
ख़लक़न मिन बअदि ख़लक़
एक पैदा करने के बाद दूसरी पैदा करने की सूरत में
وَلاَ يَعْلَمُ ٱلْعِبَادُ عِلْمَكَ
वा ला यअलमुल इबादु इल्मका
तेरे बंदे तेरे इल्म को नहीं जान सकते
وَلاَ يَقْدِرُ ٱلْعِبَادُ قَدْرَكَ
वा ला यक़्दिरुल इबादु क़द्रका
और तेरी क़दर का अंदाज़ा नहीं लगा सकते
وَكُلُّنَا فَقِيرٌ إِلَىٰ رَحْمَتِكَ
वा कुल्लुना फ़क़ीरुन इला रहमतिका
हम सब तेरी रहमत के मोहताज हैं
فَلاَ تَصْرِفْ عَنِّي وَجْهَكَ
फ़ला तस्रिफ अन्नी वज्हका
तो अपना करम भरा चेहरा मुझसे न फेर
وَٱجْعَلْنِي مِنْ صَالِحِي خَلْقِكَ
वा जअल्नी मिन सालिही ख़लक़िका
और मुझे अपने नेक बंदों में शामिल कर
فِي ٱلْعَمَلِ وَٱلأَمَلِ
फ़िल अमलि वल अमलि
अमल और उम्मीद में
وَٱلْقَضَاءِ وَٱلْقَدَرِ
वल क़ज़ाइ वल क़दरि
और तेरे फैसले और तक़दीर में
اَللَّهُمَّ أَبْقِنِي خَيْرَ ٱلْبَقَاءِ
अल्लाहुम्मा अब्क़िनी ख़ैरल बक़ा
ऐ अल्लाह, मुझे बेहतरीन ज़िन्दगी अता फ़रमा
وَأَفْنِنِي خَيْرَ ٱلْفَنَاءِ عَلَىٰ مُوَالاةِ أَوْلِيَائِكَ
वा अफ़्निनी ख़ैरल फ़ना अला मुवालाति औलियाइका
और मुझे बेहतरीन मौत दे तेरे औलिया की मुहब्बत पर
وَمُعَادَاةِ أَعْدَائِكَ
वा मुआदाति अअदाइका
और तेरे दुश्मनों से बेरुख़ी के साथ
وَٱلرَّغْبَةِ إِلَيْكَ وَٱلرَّهْبَةِ مِنْكَ
वर्रग़बत इलैका वर्र्रहबत मिन्का
तेरी तरफ़ रग़बत और तुझसे डर के साथ
وَٱلْخُشُوعِ وَٱلْوَفَاءِ وَٱلتَّسْلِيمِ لَكَ
वल ख़ुशूइ वल वफ़ाइ वत्तस्लीमि लक
और तेरे सामने झुकने, वफ़ादारी और तस्लीम के साथ
وَٱلتَّصْدِيقِ بِكِتَابِكَ
वत्तस्दीक़ि बिकिताबिक
तेरी किताब की तस्दीक़ के साथ
وَٱتِّبَاعِ سُنَّةِ رَسُولِكَ
वत्तिबाइ सुन्नति रसूलिक
और तेरे रसूल की सुन्नत की पैरवी के साथ
اَللَّهُمَّ مَا كَانَ فِي قَلْبِي
अल्लाहुम्मा मा काना फी क़ल्बी
ऐ अल्लाह, जो कुछ मेरे दिल में है
مِنْ شَكٍّ أَوْ رِيبَةٍ
मिन शक्किन औ रैबतिन
शक या शुबहा
أَوْ جُحُودٍ أَوْ قُنُوطٍ
औ जुहूदिन औ कुनूतिन
इनकार या मायूसी
أَوْ فَرَحٍ أَوْ بَذَخٍ أَوْ بَطَرٍ
औ फरहिन औ बज़खिन औ बतरिन
बेहद खुशी, फुज़ूल खर्ची या घमंड
أَوْ خُيَلاءَ أَوْ رِيَاءٍ أَوْ سُمْعَةٍ
औ खुयलाअ औ रियाइन औ सुमअतिन
तकब्बुर, दिखावा या नामवरी की ख्वाहिश
أَوْ شِقَاقٍ أَوْ نِفَاقٍ
औ शिक़ाक़िन औ निफ़ाक़िन
झगड़ा या निफाक़
أَوْ كُفْرٍ أَوْ فُسُوقٍ أَوْ عِصْيَانٍ
औ कुफ़्रिन औ फ़ुसूक़िन औ इसयानिन
कुफ़्र, गुनाह या नाफरमानी
أَوْ عَظَمَةٍ أَوْ شَيْءٍ لاَ تُحِبُّ
औ अज़मतिन औ शयइन ला तुहिब्बु
घमंड या कोई भी चीज जो तुझे पसंद न हो
فَأَسْأَلُكَ يَا رَبِّ أَنْ تُبَدِّلَنِي مَكَانَهُ إِيـمَاناً بِوَعْدِكَ
फ़असअलुका या रब्बि अन तुबद्दिलनी मकानहु ईमानन बिवअदिका
ऐ मेरे रब, इन सब की जगह अपने वादे पर ईमान अता फरमा
وَوَفَاءً بِعَهْدِكَ
व वफ़ाअन बि अह्दिका
और तेरे अहद की पाबंदी
وَرِضاً بِقَضَائِكَ
व रिज़न बि क़ज़ाइका
और तेरी क़ज़ा पर राज़ी रहना
وَزُهْداً فِي ٱلدُّنْيَا
व ज़ुह्दन फ़िद्दुन्या
और दुनिया से बे-रग़बती
وَرَغْبَةً فِيمَا عِنْدَكَ
व रग़बतं फीमा इंदका
और तेरे पास जो है उसकी चाहत
وَأَثَرَةً وَطُمَأْنِينَةً
व असरतन व तुमा'नीनतन
इख़लास और दिल का सुकून
وَتَوْبَةً نَصُوحاً
व तौबतं नसूहा
और सच्ची तौबा
أَسْأَلُكَ ذٰلِكَ يَا رَبَّ ٱلْعَالَمِينَ
असअलुका ज़ालिका या रब्बल आलमीन
ऐ रब्बुल आलमीन, मैं तुझसे यही चाहता हूँ
إِلٰهِي أَنْتَ مِنْ حِلْمِكَ تُعْصَىٰ فَكَأَنَّكَ لَمْ تُرَ
इलाही अंता मिन हिल्मिका तुअ्सा फ़कअन्नका लम तुरा
ऐ मेरे माबूद, तेरी बर्दाश्त की वजह से लोग गुनाह करते हैं जैसे तू देखता ही नहीं
وَمِنْ كَرَمِكَ وَجُودِكَ تُطَاعُ فَكَأَنَّكَ لَمْ تُعْصَ
व मिन करमिका व जूदिका तुताअु फ़कअन्नका लम तुअ्सा
और तेरे करम की वजह से तेरी इताअत की जाती है जैसे तेरी नाफरमानी हुई ही नहीं
وَأَنَا وَمَنْ لَمْ يَعْصِكَ سُكَّانُ أَرْضِكَ
व अना व मन लम यअसिका सुक्कानु अर्ज़िका
मैं और जो तेरी नाफरमानी नहीं करते सब तेरी ज़मीन के रहने वाले हैं
فَكُنْ عَلَيْنَا بِٱلْفَضْلِ جَوَاداً
फ़कुन अलैना बिल फ़ज़्लि जवादा
तो हम पर अपने फ़ज़्ल से करम फरमा
وَبِٱلْخَيْرِ عَوَّاداً
व बिल ख़ैरि अव्वादा
और भलाई के साथ हमारी तरफ रुजू करता रह
يَا أَرْحَمَ ٱلرَّاحِمِينَ
या अरहमर राहिमीन
ऐ सब रहम करने वालों से बढ़कर रहम करने वाले
وَصَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ صَلاةً دَائِمَةً
व सल्लल्लाहु अला मुहम्मदिन् व आलिहि सलातन दाइमतन
अल्लाह मुहम्मद और उनकी आल पर हमेशा की रहमतें नाज़िल करे
لاَ تُحْصَىٰ وَلاَ تُعَدُّ
ला तुह्सा व ला तुअद्दु
जो न गिनी जा सकें और न शुमार की जा सकें
وَلاَ يَقْدِرُ قَدْرَهَا غَيْرُكَ
व ला यक़्दिरु क़द्रहा ग़ैरुका
और जिनकी कदर तेरे सिवा कोई न जान सके
يَا أَرْحَمَ ٱلرَّاحِمِينَ
या अरहमर राहिमीन
ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले
रमज़ान महीने की पहली रात के आमाल
शैख़ अल-तूसी ने हारिस इब्न मुगीरा अल-नदरी की रिवायत से नक़्ल किया है कि इमाम अल-सादिक (अलैहिस्सलाम) शाबान की आख़िरी रात और रमज़ान की पहली रात को यह दुआ पढ़ा करते थे
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