जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद (स:अ) (इमाम अली (अ) की वालिदा)

   ज़िंदगी पर किताब   ज़ियारत  एमपी3   पीडीएफ  जेपीजी  |  


नके बारे में और इनके इस्लाम के लिए अज़ीम क़ुर्बानियों पर बहुत कम लिखा गया है (सिवाए इसके कि वो इमाम अली (अ) की वालिदा थीं, या उन्होंने हमारे रसूल-ए-ख़ुदा की परवरिश की और उनके लिए माँ जैसी रहीं, या उनके जनाज़े के सिलसिले में)। (जो लोग फ़ातिमा बिन्ते असद के बारे में और मालूमात रखते हों, वो अपना हिस्सा डाल सकते हैं मसर http://www.yazehra.com/fatimabint.htm )

इनकी शराफ़त

फ़ातिमा बिन्ते असद एक ऐसे ख़ानदान में पैदा हुईं जो रूहानियत का मरकज़ था। इनके दादा हज़रत हाशिम बिन अब्द मनाफ़ क़ुरैश के सरदार और काबा के ख़ादिम थे। वो क़ाबिल और सख़ी शख़्स थे। उन्होंने अपने ही ख़ानदान की एक लड़की से निकाह किया जिनसे इनके बेटे असद पैदा हुए, और असद ही फ़ातिमा बिन्ते असद के वालिद थे। क़ुरैश के क़बीले में बनी-हाशिम का ख़ानदान अपने अख़लाक़ी फ़ज़ाइल और आला इंसानी ख़ुसूसियात के लिए मशहूर है। हिम्मत, सख़ावत, बहादुरी और बहुत सी दूसरी खूबियाँ बनी-हाशिम की निशानियाँ हैं। अब्दुल मुत्तलिब जो बहुत दूरअंदेश शख़्स थे, उन्होंने शुरू से ही इनके मिज़ाज, अक़्ल और सलाहियत को परखा और अपने बेटे अबू तालिब के लिए इनका रिश्ता प्रस्तावित किया।

इनकी ख़ुसूसियात

फ़ातिमा बिन्ते असद एक बहुत ही नुमायाँ और हैरतअंगेज़ ख़ातून थीं जो हज़रत इब्राहीम (अ) के दीन पर थीं। वो अल्लाह पर ईमान रखती थीं और तमाम पिछली अंबिया की तालीमात पर अमल करती थीं। वो अल्लाह की उन तमाम किताबों पर भी ईमान रखती थीं जो उस वक़्त तक नाज़िल हो चुकी थीं (इस्लाम से पहले)। इससे पता चलता है कि वो और इनके शौहर शुरू से ही मोमिन थे और उन्हें इस्लाम की बैअत की ज़रूरत नहीं थी। अबू तालिब (अ) के ईमान में शक करना इस पाक और परहेज़गार ख़ातून की तौहीन के बराबर है, क्योंकि वो इनके निकाह में इनके वफ़ात तक रहीं, और ये इनके इस्लाम कबूल करने के दस साल बाद तक था। इनका तक़वा इतना बुलंद था कि जो दुआ ये करतीं, फ़ौरन कबूल हो जाती। हालाँकि इनकी ज़िंदगी घर की चारदीवारी में गुज़री, फिर भी फ़ातिमा बिन्ते असद एक मिसाली ख़ातून थीं। उन्होंने अपने शौहर की बहुत ख़िदमत की, अपने बच्चों से मुहब्बत की और सबसे बढ़कर रसूल (स) से। उन्होंने अबू तालिब का दिल से साथ दिया और रसूल-ए-ख़ुदा (स) की सलामती और ख़ैरियत के मामले में वो बिल्कुल सच्चे मानी में माँ थीं। इसी लिए रसूल (स) उनसे बेइंतिहा मुहब्बत और एहतराम करते थे। फ़ातिमा बिन्ते असद को ये ख़ुसूसी फ़ज़ीलत हासिल है कि उन्होंने पाँच पाक मासूमीन (अ) की परवरिश की: मुहम्मद (स), इमाम अली (अ), फ़ातिमा ज़हरा (अ), और कुछ अरसे तक इमाम हसन (अ) और इमाम हुसैन (अ) भी। किसी और ख़ातून को ये फ़ज़ीलत हासिल नहीं। वो उन बुज़ुर्ग ख़वातीन में से भी थीं जिन्होंने मदीना हिजरत की।

इनका ख़ानदान

इनके चार बेटे— तालिब, अक़ील, जा’फ़र और अली (अ.स) —और दो बेटियाँ— उम्मे हानी और जुमाना थीं; और सबसे बढ़कर मुहम्मद (स.अ.व), जो इनके परवरिश-याफ्ता (गोद लिए हुए) बेटे थे।

 इनका घर इस्लाम की हक़ीक़ी गोद (पालना) था। मुहम्मद, जो आगे चलकर इस्लाम के नबी बने, और अली, जो आगे चलकर इस्लाम के बहादुर सिपहसालार बने— दोनों इसी घर में पैदा हुए और इसी में परवान चढ़े। ये दोनों इनके तरबियत के "नतीजे" थे।  इनके शौहर अबू तालिब (अ.स) इस्लाम के सबसे बड़े मुहसिन (एहसान करने वाले) शुमार होते हैं। मुहम्मद (स.अ.व) की परवरिश और तालीम-ओ-तरबियत में इन्हें भी उन्हीं के साथ वही इम्तियाज़ हासिल है।

मौलाना हसन ज़फ़र साहिब के कुछ अशआर— जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद के घराने और जनाबे अबू तालिब (अ.स) की शान में

"नबूवत हो, इमामत हो, विलायत हो, शहादत हो       सभी ने परवरिश सहने अबू तालिब में पाई है"

रसूल मुहम्मद (स.अ.व)  मुहम्मद (स.अ.व) बचपन में अपनी वालिदा से महरूम हो गए थे, लेकिन जल्द ही उन्हें फ़ातिमा बिन्ते असद में दूसरी माँ मिल गई। इसलिए उन्हें उस मुहब्बत और शफ़क़त की कमी महसूस नहीं हुई जो सिर्फ़ माँ ही दे सकती है। उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) की शिरख़्वारी, बचपन, लड़कपन और जवानी तक पूरी देखभाल की। उन्होंने इस बात का ख़याल रखा कि नबी (स.अ.व) के पास हर चीज़ सबसे बेहतर हो। उन्होंने उन्हें अच्छे कपड़े पहनाए और अच्छी तरह खिलाया। अगर इनके शौहर बाहर दुश्मनों से मुहम्मद (स.अ.व) की हिफ़ाज़त करते थे, तो घर के अंदर उन्होंने उन्हें मुहब्बत, आराम और अमन दिया। इसी घर में मुहम्मद (स.अ.व) को जज़्बाती इत्मिनान और ख़ानदानी क़ुरबत मिली। फ़ातिमा बिन्ते असद अक्सर अपने बेटों को रसूल (स.अ.व) के बिस्तर पर सुला देती थीं, ताकि ख़तरे के वक़्त नबी (स.अ.व) महफ़ूज़ रहें और अगर कोई नुक़सान हो तो उनके बेटे पर हो। उन्होंने इस्लाम के लिए अपने बेटों की क़ुर्बानी दी। जब मुहम्मद (स.अ.व) मक्का से रवाना हुए और हज़रत अली (अ.स) उनकी जगह सोए, तो उन्होंने एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा—हालाँकि अली (अ.स) सख़्त ख़तरे में थे।

अक़ील इब्न अबी तालिब  इनकी पैदाइश 590 में हुई। इनकी कुनियत अबू यज़ीद थी। इन्होंने हुदैबिया के वक़्त इस्लाम क़ुबूल किया और 8 हिजरी में मदीना पहुँचे। इन्होंने जंग-ए-मू’ता में शिरकत की। बुढ़ापे में इनकी आँखों की रोशनी चली गई। 96 साल की उम्र में इनका इंतिक़ाल हुआ। इनके बेटे मुस्लिम इब्न अक़ील करबला के पहले शहीद थे। वे कूफ़ा के लिए सफ़ीर-ए-हुसैन थे। मुस्लिम इब्न अक़ील के दो बेटे— मुहम्मद और इब्राहीम— भी कूफ़ा में शहीद हुए।

जा’फ़र तय्यार   एक मशहूर सिपहसालार थे। उन्होंने जंग-ए-मू’ता में इस्लामी लश्कर की क़ियादत की और उसी जंग में शहीद हुए। उनके दोनों बाजू कट गए, और उन्होंने इस्लाम का अलम अपने दाँतों से थामे रखा। वे इस्लाम के “परों वाले शहीद” कहलाए। फ़ातिमा बिन्ते असद को अपने बेटे जा’फ़र से ख़ास लगाव था; वे उन्हें दूसरों से ज़्यादा चाहती थीं क्योंकि वे मुहम्मद (स.अ.व) से बहुत मिलते-जुलते थे और बेहद ज़हीन थे। लेकिन इस्लाम की ख़ातिर उन्होंने उनके और उनकी ज़ौजा अस्मा बिन्ते ‘उमैस से जुदाई बर्दाश्त की (जब वे रसूल (स.अ.व) के हुक्म पर मुसलमान मुहाजिरीन के पहले क़ाफ़िले के साथ हब्शा गए)। लगता है कि उन्हें अपने ख़ानदान से ज़ुबान पर महारत विरासत में मिली थी; वे फ़सीह-ओ-बलीग़ वक्ता थे और लोगों को अपने नज़रिए पर राज़ी कर लेते थे। इसी हुनर से उन्होंने हब्शा के बादशाह को भी क़ायल कर लिया था, जब क़ुरैश ने मुसलमानों को उनके हवाले करने की दरख़्वास्त की थी। उनके आठ बेटे थे। उनके बेटे अब्दुल्लाह ने ज़ैनब (स.अ) से निकाह किया और मुहम्मद ने उम्मे कुलसूम (अ.स) से। जनाब अब्दुल्लाह इब्न जा’फ़र के बेटे— औन और मुहम्मद— कर्बला की सरज़मीन पर शहीद हुए।

अली इब्न अबी तालिब  फ़ातिमा बिन्ते असद के छोटे बेटे अली इब्न अबी तालिब (अ.स) थे। इस अज़ीम इमाम का तआरुफ़ देने की ज़रूरत नहीं। लेकिन मैं उनकी पैदाइश के कुछ वाक़ेआत बयान करना चाहता हूँ क्योंकि इसका ताल्लुक़ भी उस बुज़ुर्ग ख़ातून— फ़ातिमा बिन्ते असद— से है। वे तीन दिन तक काबा में रहीं और उन्हें जन्नत के फलों से फ़ायदा उठाने की सआदत मिली। हज़रत ईसा (अ) की पैदाइश के वक़्त उनकी मुअज़्ज़ज़ वालिदा को बैतुल-मुक़द्दस से बाहर जाने पर मजबूर किया गया था। उनसे कहा गया: ऐ मरयम (मिरियम)! बैतुल-मुक़द्दस से बाहर निकल जाओ, क्योंकि यह इबादत की जगह है, बच्चे जनने की नहीं। लेकिन जब हज़रत अली (अ.स) की पैदाइश का वक़्त क़रीब आया, तो आवाज़ आई: ऐ फ़ातिमा बिन्ते असद! घर (काबा) में दाख़िल हो जाओ।

जुमे के दिन, माह-ए-रजब की बरकत वाली 13 तारीख़ को, रसूल-ए-ख़ुदा मुहम्मद (स.अ.व) की बाइसत से 12 साल पहले, फ़ातिमा बिन्ते असद ने महसूस किया कि अब उनके यहाँ बच्चे की विलादत होने वाली है। वे बैतुल्लाह (काबा) आईं और चलते-चलते तवाफ़ करने लगीं और दुआ करती रहीं: “ऐ अल्लाह! मैं तुझ पर, तेरे भेजे हुए रसूलों पर और तेरी नाज़िल की हुई किताबों पर ईमान रखती हूँ। मैं अपने दादा इब्राहीम (अ.स) की कही हुई बातों पर ईमान रखती हूँ, जिन्होंने इस क़दीम घर (काबा) को तामीर किया। पस इस घर के बनाने वाले के वास्ते, और मेरे शिकम में पल रहे उस बच्चे के वास्ते, जो मुझसे बातें करता है और मेरा मददगार और दोस्त है, मैं तुझसे दुआ करती हूँ कि मेरी तकलीफ़ आसान फ़रमा। जो बच्चा मैं अपने पेट में लिए हुए हूँ, वह तेरी अज़मत और क़ुदरत (जलाल) की निशानी है।”  (अल-अरबिली, कश्फ़-उल-ग़ुम्मा, जिल्द 1, बाब: इमाम अली (अ.स)।

फ़ातिमा बिन्ते असद आराम के लिए काबा की दीवार से टेक लगा कर खड़ी हो गईं। मोअज्जिज़ाना तौर पर दीवार खुल गई। फ़ातिमा बिन्ते असद अंदर दाख़िल हो गईं और दीवार उनके पीछे बंद हो गई। रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) के चाचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब ने इस मोअज्जिज़े को देखा। वे और उनके साथी बैतुल्लाह के दरवाज़े की तरफ़ दौड़े, जो बंद था, और उसे खोलने की बहुत कोशिश की मगर नाकाम रहे। जब उन्हें समझ आ गया कि यहाँ ख़ुदाई क़ुदरत काम कर रही है, तो उन्होंने दख़ल देना छोड़ दिया। इस वाक़िये की ख़बर जल्द ही पूरे मक्का में फैल गई।

इमाम अली (अ.स) काबा के अंदर पैदा हुए, उनकी आँखें बंद थीं और उनका जिस्म अल्लाह तआला के सामने सज्दे की हालत में था। फ़ातिमा तीन दिन तक काबा में रहीं, और जब चौथा दिन आया तो वे अपने बच्चे को गोद में लिए बाहर निकलीं। उन्होंने रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) को देखा जो बेसब्री से नवजात बच्चे को लेने के लिए इंतज़ार कर रहे थे। इस तरह इस दुनिया में छोटे अली (अ.स) ने सबसे पहले अल्लाह के रसूल मुहम्मद (स.अ.व) का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा। काबा के अंदर इमाम अली (अ.स) की विलादत तारीख़-ए-आलम में यकता है। न कोई नबी और न ही कोई वली कभी इस तरह के शरफ़ से नवाज़ा गया। (ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ द फ़ोर्टीन इनफ़ैलेबल्स, वर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इस्लामिक सर्विसेज़, तेहरान: 1984, सफ़हात 51-52।) यह एक मुसल्लम तारीख़ी हक़ीक़त है जिसे तमाम मोअर्रिख़ीन ने माना है कि बैतुल्लाह इमाम अली बिन अबी तालिब (अ.स) की पैदाइश की जगह है। अबू तालिब और उनके घर वालों को मुबारकबाद दी गई। जब वे बैतुल्लाह पहुँचे तो उन्होंने मुहम्मद अल-मुस्तफ़ा (स.अ.व) को बच्चे को गोद में लिए हुए पाया। (इब्न अल-सब्बाग़ अल-मालिकी, अल-फ़ुसूल अल-मुहिम्मा फ़ी मआरिफ़त-इल-आइम्मा, बाब 1, सफ़ा 13।) फिर रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) बच्चे अली को अबू तालिब के घर ले गए, जहाँ वे ख़ुद पले-बढ़े थे।

फ़ातिमा बिन्ते असद बयान करती हैं कि जब वे काबा के अंदर थीं तो वे लगातार एक आवाज़ सुनती रहीं: इस बच्चे का नाम अली रखो। अली एक ख़ुशनुमा और उम्मीद जगाने वाला नाम है। यह बुलंदी, शरफ़ और रफ़अत का मतलब रखता है। अली (अ.स) से पहले किसी का यह नाम नहीं था, और न उनसे पहले और न उनके बाद किसी को बैतुल्लाह की मुक़द्दस दीवारों के अंदर पैदा होने का यह शरफ़ नसीब हुआ।

इनका जनाज़ा

अब हम रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) के ज़माने में फ़ातिमा बिन्ते असद (अ.स) के जनाज़े का ज़िक्र करते हैं। जब फ़ातिमा बिन्ते असद (हज़रत अबू तालिब की ज़ौजा और इमाम अली (अ.स) की वालिदा) का इंतिक़ाल हुआ (एक रिवायत के मुताबिक़ 23 सफ़र को), तो रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) को बहुत ग़म हुआ।

अनस बिन मालिक कहते हैं कि जब नबी-ए-अकरम (स.अ.व) को फ़ातिमा बिन्ते असद की वफ़ात की ख़बर मिली, तो वे फ़ौरन उनके घर गए, उनके पास बैठ गए और उनके लिए दुआ की।

उन्होंने अपनी कमीज़ उनके कफ़न के लिए दी और दुआ की कि अल्लाह उन्हें बख़्श दे और जन्नत का लिबास अता फ़रमाए।

जब क़ब्र तैयार की गई तो रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) ने ख़ुद उसे देखा और अपने ही हाथों से उन्हें क़ब्र में उतारा।

इस तरह वे उन चंद खुशनसीब लोगों में से थीं जिनकी क़ब्र रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) ने ख़ुद देखी। 

 बेशक रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) ने फ़ातिमा बिन्ते असद (सरदार-ए-मोमिनीन की वालिदा) को अपनी ही चादर से कफ़न दिया। जब औरतें उन्हें ग़ुस्ल दे चुकीं तो नबी-ए-अकरम (स.अ.व) ने उनका जनाज़ा अपने कंधे पर उठाया और क़ब्र तक ले जाते वक़्त तक उनके जनाज़े के नीचे रहे।

 रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) का “जनाज़े के नीचे रहना” इसका मतलब यह है कि उन्होंने उसे कंधे पर नहीं उठाया। पूर्वी अफ़्रीक़ा में एक अजीब रस्म पाई जाती है: मरने वाले का बेटा हक़ीक़त में “जनाज़े के नीचे” चलता है; वह न तो जनाज़ा उठाता है और न दूसरों की मदद करता है, बल्कि उठाने वालों के बीच में खड़ा हो जाता है और उन्हें परेशानी में डाल देता है।

 फिर रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व) ने जनाज़े को क़ब्र के पास रखा, ख़ुद क़ब्र में दाख़िल हुए और उसमें लेट गए। फिर उठे, जिस्म को अपने हाथों में लिया और क़ब्र में रखा। फिर अपना चेहरा उनके चेहरे के क़रीब करके देर तक उनसे सरगोशी करते रहे और कहते रहे: “तेरा बेटा, तेरा बेटा।” फिर बाहर आए, क़ब्र को भरा और ठीक तरह से बनाया। फिर क़ब्र की तरफ़ झुके और लोगों ने सुना कि नबी-ए-अकरम (स.अ.व) फ़रमा रहे थे:   “अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। ऐ अल्लाह! मैं उसे तेरी अमानत में देता हूँ।”
 फिर वे वापस लौटे।
 मुसलमानों ने कहा:  “ऐ रसूल-ए-ख़ुदा, आज हमने आपको ऐसे काम करते देखा है जो आपने पहले कभी नहीं किए!”
 नबी (स.अ.व) ने फ़रमाया:
  "आज मैंने अबू तालिब की नेकी (नेमत/सहारा) खो दी:  बेशक, वह मुझ पर इतनी मेहरबान थीं कि जब भी उनके पास कोई अच्छी चीज़ होती, वह उसे अपने लिए या अपने बच्चों के लिए रखने के बजाय मुझे दे देतीं।  और मैंने एक बार कहा था कि क़यामत के दिन लोग नंगे हालत में उठाए जाएंगे।  उन्होंने कहा:  "हाय शर्म!"  तो मैंने उन्हें यक़ीन दिलाया कि अल्लाह उन्हें कपड़ों के साथ उठाएगा।  और मैंने क़ब्र के दबाव (सिक़्त) का ज़िक्र किया, तो उन्होंने कहा:  "हाय कमज़ोरी!"  तो मैंने उन्हें ज़मानत दी कि अल्लाह उन्हें उससे बचाएगा।  इसी वजह से मैंने उन्हें अपने ही चोग़े से कफ़न दिया, और उनकी क़ब्र में लेट गया।  और मैं उनके क़रीब घुटनों के बल बैठा ताकि उन्हें (जवाब) सिखा दूँ जो उनसे पूछा जा रहा था।  और बेशक उनसे उनके रब के बारे में पूछा गया; तो उन्होंने कहा, "अल्लाह मेरा रब है"; और उनके नबी के बारे में पूछा गया; तो उन्होंने जवाब दिया,  "मुहम्मद (स.अ.व)"।  फिर उनसे उनके वली और इमाम के बारे में पूछा गया; तो वे कुछ उलझीं और थोड़ी देर ठिठकीं; तो मैंने उनसे कहा, "तेरा बेटा, तेरा बेटा"।  तब उन्होंने कहा, "मेरा बेटा ही मेरा इमाम है"।  फिर दोनों फ़रिश्ते चले गए और कहने लगे, "हमारा तुम पर कोई इख़्तियार नहीं, तुम ऐसे सोओ जैसे दुल्हन सोती है (बिल्कुल बेफ़िक्र)।"  फिर वे दोबारा वफ़ात पा गईं (यानी उनकी रूह फिर से उनके जिस्म से निकाल ली गई)।"

फ़ातिमा बिन्ते असद के बारे में मुहम्मद (स.अ.व) की इरशादात
 
    "ख़ुदा आपकी बुज़ुर्ग रूह पर बरकत नाज़िल करे। आप मेरे लिए अपनी ही माँ की तरह थीं। आपने मुझे खिलाया, जबकि आप खुद भूखी रहती थीं। आपका मक़सद अपने आमाल से ख़ुदा को राज़ी करना था।"  नबी (स.अ.व) अक्सर फ़रमाते थे, "मैं यतीम था और उन्होंने मुझे अपना बेटा बना लिया। अबू तालिब के बाद मेरे लिए वह सबसे ज़्यादा मेहरबान थीं"।

"ऐ ख़ुदा! ज़िंदगी और मौत तेरे हाथ में है। सिर्फ़ तू ही है जो कभी नहीं मरता। मेरी माँ, फ़ातिमा बिन्ते असद, पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उन्हें जन्नत में एक मकान अता कर। तू सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।"

     "ऐ मेरी प्यारी माँ, अल्लाह आपको अपनी हिफ़ाज़त में रखे। आपने कई बार भूखे रहकर मुझे अच्छी तरह खिलाया। आपने मुझे नफ़ीस चीज़ों से खिलाया और पहनाया, जो आपने अपने ऊपर हराम कर ली थीं। अल्लाह यक़ीनन आपके इन आमाल से ख़ुश होगा। और आपकी नियत अल्लाह की रज़ामंदी, ख़ुशनूदी और आख़िरत की कामयाबी हासिल करना ही थी।"

"वह अपने बच्चों को भूखा रखती थीं, मगर यक़ीन बनाती थीं कि मुझे भरपूर खाने को मिले। वह अपने बेटों के बाल नहीं सँवारती थीं, मगर मेरे सिर पर तेल लगातीं और मेरे बाल सँवारती थीं"।

उनकी कुर्बानियाँ

जब भी इस्लाम पर सख़्त हमले हुए, तो अबू तालिब (अ.स) और फ़ातिमा बिन्ते असद के बेटों ने ढाल बनकर डटकर मुकाबला किया, और हर तरह की आफ़तों व मुसीबतों का बोझ—जिसमें शहादतें और वतन-ख़िदरी (जिलावतनी) भी शामिल थी—सब्र के साथ उठाया, मगर इस्लाम की हिफ़ाज़त से एक कदम पीछे नहीं हटे। इस्लाम के शुरुआती दौर में हज़रत अली (अ.स) और हज़रत जाफ़र-ए-तैय्यार (अ.स) की कुर्बानियों से कौन बे-ख़बर है? वे हर मैदान और हर मोर्चे में हमेशा आगे रहे, और दीन-ए-इस्लाम की खातिर अपनी जान न्योछावर करने के लिए हर दम तैयार रहे। वे अबू तालिब और फ़ातिमा बिन्ते असद के सच्चे बेटे थे और उनकी बे-ग़रज़ ख़िदमतों की जीती-जागती तस्वीर। कर्बला में भी कई जगह उनकी कुर्बानी और वफ़ादारी की मिसालें नज़र आती हैं। कर्बला के तारीख़-साज़ वाक़िये में बनी-हाशिम में से जिसे भी वह बहुप्रतीक्षित शहादत नसीब हुई, वह अबी तालिब और फ़ातिमा बिन्ते असद के बाग़ का एक फूल था। आज जहाँ कहीं इस्लाम का नाम बाक़ी है, वह उनकी कुर्बानियों का ही समर है। इस्लाम के बाग़ की ताज़गी इन्हीं फूलों की बदौलत है।

ये वे अठारह बनी-हाशिम हैं जो इमाम हुसैन (अ.स) के साथ सरज़मीन-ए-कर्बला पर शहीद हुए

अब्दुल्लाह बिन मुस्लिम(अ.स)                                 क़ासिम बिन अल-हसन(अ.स)
.मुहम्मद इब्न मुस्लिम(अ.स)                             अब्दुल्लाह इब्न अल-हसन(अ.स)
जाफ़र बिन अकील(अ.स)                                          अब्दुल्लाह बिन अली(अ.स)
अब्दुर्रहमान बिन अकील(अ.स)                             उस्मान बिन अली(अ.स)
अब्दुल्लाह इब्न अकील(अ.स):                                  जाफ़र बिन अली (अ.स)
मूसा इब्न अकील(अ.स)                                          अलमदार-ए-कर्बला अब्बास बिन अली(अ.स)
औन बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र(अ.स)                       अली अकबर बिन हुसैन(अ.स)
मोहद. बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र-ए-तैय्यार(अ.स )     मोहद. इबी सईद बिन अकील (अ.स)
अब्दुल्लाह अल-अकबर बिन अल-हसन(अ.स)              अली असगर बिन हुसैन(अ.स)


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